Saturday, September 3, 2011

दर दर -ठोकर

दर दर -ठोकर
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बढती है मंहगाई की दर
बिजली की दर,पानी की दर
कभी टेक्स दर,कभी ब्याज दर
मंहगी सब्जी,बढ़ी प्याज  दर
बहुत घुटन है मन के अन्दर
मुश्किल का है भरा समंदर
मंहगाई बढ़ गयी इस कदर
कद है लंबा,छोटी चादर
तितर बितर हो रहे सभी घर
कदम कदम पर लगती ठोकर
परेशान है जीवन,जर्जर
रहो भटकते,तुम बस दर दर
इसीलिए विनती है सादर
इधर उधर की बातें ना कर
सच्चे मन से कुछ प्रयत्न कर
कम करदो मंहगाई की दर

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

तुम नहीं थी

तुम नहीं थी
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नींद मुझको नहीं आई,तुम नहीं थी
कामनाये  कसमसाई ,तुम नहीं थी
चांदनी थी रात शीतल
याद तुम आई प्रतिपल
बड़ा ही बेचैन था मन
और तन की बढ़ी सिहरन
ओढ़ ली मैंने रजाई,तुम नहीं थी
मगर उष्मा नहीं आई,तुम नहीं थी
नींद  रूठी,उचट कर के
बांह में तकिये  को भर के
बहुत कोशिश की ,की सोलूं
कुछ मधुर सपने संजोलूँ
पड़ो तुम जिनमे दिखाई, तुम नहीं थी
नींद यादों ने उड़ाई,तुम नहीं थी
याद आया महकता तन
अकेली पड़ गयी धड़कन
क्या बताऊँ ,आप बीती
किस तरह से रात बीती
भोर तक भी सुध न आई,तुम नहीं थी
बस तुम्हारी याद आई,तुम नहीं थी
जिंदगी में,इस, हमारी
अहमियत क्या तुम्हारी
तुम न थी,जब जान पाया
प्यार को पहचान पाया
समझ  में ये बात आई,तुम नहीं थी
बड़ी जालिम है जुदाई,तुम नहीं थी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सच्ची तृप्ति

सच्ची तृप्ति
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रोज रोज फ्रीजर में,
रखा पुराना खाना,
माइक्रोवेव ओवन में,
गरम करके खाता हूँ
पर मुझको लगता है,
सिर्फ पेट भरने की,
औपचारिकता निभाता हूँ
वर्ना खाने का जो स्वाद,
माँ के हाथ की पकाई,
गरम गरम रोटियों में,
सरसों के साग की ,
सौंधी सी खुशबू में,
और गन्ने के रस की खीर में आता है,
सच्ची तृप्ति तो वही दिलाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

यादें

यादें
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तेज धूप गर्मी से,
जब छत की ईंटों के,
थोड़े जोड़ उखड जाते है
और बारिश होने पर,
जोड़ों की दरारों में,
कितने ही अनचाहे,
खर पतवार निकल जाते है
जीवन की तपिश से,
जाने अनजाने में,
रिश्तों के जोड़ों में,
जब दरार पड़ती है
और बूढी आँखों से,
बरसतें है जब आंसू,
तो बीती यादों के
कितने ही खर पतवार,
बस उग उग आते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

अमरुद का पेड़

अमरुद का पेड़
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एक छोटा पौधा रोंपा था,मैंने घर की बगिया में
मधुर फलों की आशा की थी,इस बेगानी दुनिया में
सींचा मैंने अति ममत्व से,बच्चों सा  ,पोसा ,पाला
बड़े जतन से,सच्चे मन से,रोज रोज देखा,भाला
धीरे धीरे पौधा विकसा,उगी टहनियां,हुआ घना
उसने हाथ पैर फैलाये,आज गर्व से खड़ा,तना
चिकना तना,रजत सी आभा,भरा पूरा सा रूप  खिला
लगे चहकने,पंछी ,तोते, एसा नया स्वरूप मिला
उसका कद,मेरे भी कद से,दूना,तिगुना बढ़ा हुआ
मैंने बोया था जो पौधा,आज वृक्ष बन खड़ा हुआ
पिछले बरस,एक टहनी पर,देखे, दो अमरुद लगे
मेरे नन्हे से बेटे के,  जैसे थे  दो  दांत   उगे
और इस साल,भरा है फल से,फल छोटे है,कच्चे है
एसा लगता टहनी पर चढ़,खेल रहे ,कुछ बच्चे है
पर नियति की नियत अजब है,उसने है दिल तोड़ दिया
फल पकने का मौसम आया,मैंने वो घर ,छोड़ दिया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'