Tuesday, June 2, 2015

जल कितना नायाब हो गया

           जल कितना नायाब हो गया

 ये क्या  आज जनाब हो गया ,मिले शुद्ध जल,ख्वाब हो गया
  आबो हवा इस तरह बदली ,जीवन बड़ा , खराब हो गया
             बिकता आज ,बंद बोतल में ,जल कितना नायाब हो गया
मिला दूध संग ,दूध बन गया ,बहा गंदगी संग बन नाली
जिस रंग मिलता,उस रंग रंगता ,इस पानी की बात निराली
                मीठा कभी,कभी खारा है, मादक कभी शराब हो गया
सत्तर प्रतिशत पानी तन में ,फिर भी तन ,पानी को तरसा
उड़ा ग्रीष्म में बादल बन कर,बारिश में रिमझिम कर बरसा
             बहा ले गया कितनो को ही ,उग्र हुआ ,सैलाब हो  गया
पानी मिला ,लहू के संग तो,दौड़ गया ,तन की नस नस में
पानी ने ,खाना पचवाया ,  मिल कर आमाशय  के  रस में        
                 थोड़ा बन कर बहा पसीना ,बचा हुआ पेशाब हो गया
सुख में आँखों को पनियाया ,दुःख में आंसू बनकर टपका
कभी बहा बन गंगा ,जमुना ,सागर से मिलने को लपका
            सहमा रहा कभी कूवे में,और कभी तालाब हो  गया
खेतों में ,बीजों को सींचा ,तो वह फसल बना ,लहलाया
बगिया में जब गया घूमने ,क्यारी क्यारी को महकाया
             नाचा कभी,जूही बेला संग ,तो फिर कभी गुलाब हो  गया
कोई पीता  चुल्लू  भर कर,कोई डूबता चुल्लू भर में
कोई होता पानी पानी,कभी शरम में,या फिर डर में
                 पानी अगर ,चढ़ा चेहरे पर ,तो वह रूप,शबाब हो  गया
पूजा में ,स्नान ध्यान में ,खानपान में जल का सम्बल
मंदिर में चरणामृत बनता ,शिवशंकर को चढ़ता है जल
              देख चाँद को उछला करता ,विष्णु का  आवास  हो गया
मैल दूसरों  का  हर लेता ,चाहे  खुद  हो  जाता  मैला
जल है अमृत ,जल है जीवन ,जलन मिटाता है अलबेला
            जम कर बरफ,वाष्प ऊष्मा से ,नारियल में छुप,डाब हो गया
             बिकता  आज बंद बोतल में ,जल कितना ,नायाब हो गया

मदन मोहन बाहेती'घोटू '  

हवा हवाई

              हवा हवाई

हवा कुछ इस तरह से आजकल बदली जमाने की
हवा सब हो गयी है  संस्कृति , रिश्ते  निभाने  की
कमाए चार  पैसे क्या ,  हवा में   लोग उड़ते है
हवा सारी  निकल जाती ,हक़ीक़त से जो जुड़ते है 
बनाते है हवाई  जो किले ,और कुछ  नहीं  करते 
हवा थोड़ी सी भी बदली ,   पतंगों की तरह कटते 
हवाबाजी दिखाते है ,बने अफसर जो  दफ्तर में
हवा उनकी खिसकती है ,पत्नी के सामने ,घर में
हवा के रुख के संग चलना ,समझदारी है कहलाता
हवा में जो उड़ा देता ,बड़ो की सीख,  पछताता
हवा जब तेज चलती है ,तो सब कुछ है उड़ा देती
हवा जब मंद बहती है तो मौसम का मज़ा देती
दर्द होता हवा मुंह से ,आह बन कर निकलती है 
उदर का दर्द, जाता जब, हवा नीचे  खिसकती  है
हवा में सांस हम लेते ,न जी सकते ,हवा के बिन
हवा है खुश्क ,हम सबकी,बढे मंहगाई है हर दिन

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

लाल मिर्च और तुम

         लाल मिर्च और तुम

हरी ना ,काली ना वो लाल लाल मिर्ची थी ,
   और बस एक ही चुटकी तो डाली थी हमने
सोच कर ये कि तुमको स्वाद ये सुहायेगा,
  पता ना मुंह तुम्हारा इतना क्यों लगा जलने
कहीं कल पान जो खाया था मुंह रचाने को,
   किसी ने उसमे अधिक चूना लगाया होगा
काट ली होगी जुबां और मुंह , चूने ने,
   स्वाद जो तेरे हसीं होठों का पाया  होगा 
या कि फिर तुमने ही काटी जुबान खुद होगी ,
    बड़े चटखारे ले के खा रही थी कल खाना
या कमी तुममे हो गयी  विटामिन डी की,
      रही हो 'ए 'क्लास ही तो तुम ,जाने जाना
ये भी हो सकता है कि लाल लाल होठों ने ,
      जलन के मारे की हो सारी ये नाकाबंदी
घुसे जो लाल कोई चीज जो मुंह के अंदर ,
     लगे मुंह जलने,लगी मिर्च पे यूं पाबंदी
समझ के गोलगप्पा मुझको प्यार करती हो ,
   और रह रह के जब भरती  हो मुंह से सिसकारी
मेरा दिल बावला सा उछल उछल जाता है,
      तुम्हारी ये अदा ,लगती मुझे बड़ी  प्यारी 
इसलिए चाहता था ,चटपटा सा कुछ खाकर ,
     मिलन की आग सी लग जाए तुम्हारे दिल में
हरी ना,काली ना वो लाल लाल मिरची थी,
     और बस एक ही  चुटकी तो डाली थी हमने
सोच कर ये कि तुमको स्वाद ये सुहायेगा ,
      न जाने मुंह तुम्हारा ,इतना क्यों लगा जलने

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

ये ग़ालिब हो नहीं सकता

           ये ग़ालिब हो  नहीं सकता

तुम्हारे गाल अच्छे है और लब भी खूबसूरत है ,
      मगर ग़ालिब तुम्हे कह दूँ ,ये मुझ से हो नहीं सकता
मियां ग़ालिब का अंदाजे बयां सब से निराला था,
     मगर अंदाज तुम सा भी ,किसी का हो नहीं सकता
बड़ा बेआबरू होकर तेरे कूचे से निकला हूँ ,
      मैं  कितनी बार ही लेकिन ,तुझे मैं  खो नहीं सकता
दिले नादाँ के दर्दों की ,दवाई पूछता सबसे,
       इश्क़ पर जोर ग़ालिब का भी देखो  हो नहीं सकता
गालिबन रोज तुम गाली ,मुझे देती हो शेरों सी,
        मैं कुत्ते सा हिलाता दुम ,शरम  से रो नहीं सकता 
हमारी फांकामस्ती ने,रंग क्या क्या दिखाये  है ,
       पकाता ,माँजता बर्तन पर कपडे  धो नहीं  सकता

घोटू

राहुल के -मन की बात -मोदीजी से

             राहुल के -मन की बात -मोदीजी से

मुझे मालूम  स्विज़रलैंड है इंग्लैंड ,अमरीका,
     पता है इटली का,थाईलैंड का बैंकॉक है मालूम
और तुम घूमते ही रहते हो ,देशों,विदेशों में,
    न जाने साल भर में देश कितने घूम आये तुम
कहीं बच्चों के संग खेलो ,कहीं तबला बजाते हो ,
    जिधर भी जाते हो,होता उधर मोदी ही मोदी है 
न जाने कौन सा जादू चलाते हो तुम लोगों पर,
    मुझे ना पूछता कोई, मेरी लुटिया  डुबो दी  है
अभी तक देश की सत्ता ,हमारे हाथों में ही थी ,
      हमारे पुश्तैनी धंधे पे , तुमने सेंध  मारी  है
मैं तपती धूप में,गाँवों में सड़कों पर रहूँ फिरता,
    करूं पदयात्राएं ,तुमने वो  हालत  बिगाड़ी  है
मैं भी पीएम बन सकता था पर अम्मा खिलाड़ी है,
  अपने रिमोट से दस साल तक सत्ता चलाई है
बना कर सबको कठपुतली ,नचाया उँगलियों पर था,
   घोटाले करवा हमने की ,करोड़ों की कमाई है
मगर हम ये समझते थे कि हिन्दुस्थान की जनता ,
  बड़ी भोली है,बहकावे में ,आ जाएगी  वादों पर
मगर तुमने दिखा सपने कि अब आएंगे अच्छे दिन,
   पलीता ही लगा डाला, हमारे सब इरादों पर
जो वादे इतने सालों से ,किये हमने चुनावों मे ,
    हमारे उन ही वादों को,चुरा ,जीते इलेक्शन तुम
अगर इनमे से आधे भी ,जो वादे पूर्ण कर दोगे ,
  तो फिर अगले इलेक्शन तक,हमारी हस्ती होगी गुम
घूम कर इतने देशों में,छवि अपनी निखारी है,
   हमारे देश की छवि को भी ,कुछ  तुमने सुधारा  है
मगर मैं और मेरी पार्टी आ जाए हाशिये पर,
   कभी भी बात ये मुझको ,नहीं होती गंवारा    है
मुझे मालूम है कि कुछ पुराने मेरे चमचे है,
    चने के झाड़ पर मुझको ,चढ़ाते  रहते है अक्सर
भले ही कुछ भी दूँ भाषण,मगर ये जानता हूँ मैं ,
    कि ये सरकार तुम्हारी ,कर रही काम है बेहतर
मगर मजबूरी मेरी है,तभी आलोचना करता,
     मुझे अस्तित्व अपना भी तो रखना देश में कायम
इसलिए रोज हंगामा,ये पदयात्रायें  और ड्रामा,
       प्रदर्शन  ,मोरचेबाजी ,रोज ही करते रहते हम
भले तुम सूट पहनो या कि आधी बांह का कुरता ,
     पहनना वस्त्र मरजी के,सभी को है ये आजादी
हम पिछले साठ  सालों से ,सिर्फ वादे रहे करते ,
     मगर तुमने,बरस भर में तरक्की करके दिखलादी
     
   मदन मोहन बाहेती'घोटू'