Saturday, July 29, 2017

मटर पनीर 

मैं ,फटे हुए दूध सा ,
दबाया गया ,रसविहीन ,
टुकड़ों में काटा गया पनीर 
तुम ,हरी भरी,गठीली ,
गोलमोल मटर के दानो सी ,
मटरगश्ती करती हुई ,अधीर 
टमाटर की ग्रेवी की तरह ,
लिए हुवे लाली 
यौवन से भरी,मतवाली 
गृहस्थी की कढ़ाई में ,हमारा मिलन 
आपसी नोकझोंक वाली छौंक से ,
मसालेदार हुआ हमारा वैवाहिक जीवन 
आज सुखी है,आबाद है 
उसमे। मटर पनीर वाला स्वाद है 

घोटू 
घर या घरौंदा 

हमें याद आते है वो दिन 
जब जिंदगी के शुरुवाती सफर में 
रहा करते थे हम ,किराये के एक घर में 
तब मन में एक सपना होता था ,
कि कभी ऐसे दिन भी  आएंगे 
जब हम अपना खुदका एक घर बनाएंगे 
और उसे मन मुताबिक़ सजायेंगे 
सबका अपना अपना कमरा होगा 
पूरा घर रौनक से भरा होगा 
और पूरा करने अपना यही ख्वाब 
काम में जुटे रहे दिनरात 
और फिर एक दिन ऐसा भी आया 
जब हमने अपना घर बनाया 
पर तब तक बच्चे ,पढ़ाई के चक्कर में 
रहने लगे हॉस्टल में 
कभी कभी होली दिवाली आते थे 
खुशियों की महक फैलाते थे 
एक भरे पुरे घर का अहसास कराते थे 
और फिर कुछ दिनों में चले जाते थे 
फिर बेटी की शादी हो गयी 
वो अपने ससुराल चली गयी 
बेटों ने विदेशो में जॉब पा लिया 
और वहीँ पर अपना घरसंसार बसा लिया 
और हमारा बड़े अरमान से बनाया,आशियाना 
हो गया  वीराना 
अब उसमे मैं और मेरी पत्नी ,
जब अकेले में काट रहे अपना बुढ़ापा है 
हमें वो किरायेवाला मकान बहुत याद आता है 
जब उस छोटे से घर में ,
चहल पहल और रौनक रहती थी 
खुशियों की गंगा बहती थी 
तब किराये का ही सही ,
वो घर ,घर लगता था ,
और आज ,
जब खुद का इतना बड़ा बंगला है 
पर तन्हाई में लगता एक जंगला है 
जिसमे मैं और मेरी पत्नी ,
कैदी की तरह एक दुसरे की सुनते रहते है 
अपने बड़े अरमान से बुने हुए सपनो को ,
उधेड़ते और फिर से  बुनते रहते है 
हमारे दिल की तरह ,पूरा घर सूना पड़ा है 
कई बार लगता है ,
घर नहीं,एक घरौंदा खड़ा है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
चूना 

१ 
दीवारों पर लग कर मैं दीवारें सजाता हूँ 
लगता हूँ पान में तो होठों को रचाता हूँ 
कोशिशें करता हूँ जो उनको निखारने की,
उनको ये शिकायत है ,मैं चूना लगाता हूँ 
२ 
चूने की दीवारों पर ,जब चूना लगता है ,
तो उनकी रौनक फिर ,और भी निखरती है 
रूप कातिलाना है ,सुन्दर और सुहाना है,
लगती है जालिम जब,सजती  संवरती  है 
मोती सी झलकाती,दन्तलड़ी मुस्काती ,
देखने वालों पर,बिजलियाँ  गिरती है 
सोने सा अंग अंग,भर जाता नया रंग ,
जब थोड़ा अलसा वो ,अंगड़ाई भरती है 

घोटू 
सबकी नियति 

इतने अंडे देख रहे तुम,कोई कब तक मुस्काएगा 
नियति एक ,टूटना सबको,हर अंडा  तोडा जाएगा 
कोई यूं ही ,चोंटें खा खा ,करके चम्मच की टूटेगा 
उसे दूध में मिला कोई ,ताक़त पाने का ,सुख लूटेगा 
डूबा गरम गरम पानी में ,कोई अंडा ,जाए उबाला 
और तोड़ कर,उसे काट कर ,खाया जाए वो बेचारा 
कोई तोड़ कर ,फेंटा जाता ,गरम तवे पर जब बिछ जाता 
तो प्यारा सा ,आमलेट बन,ब्रेकफास्ट में ,खाया जाता 
कुछ किस्मतवाले ,तोड़े भी जाते ,फेंटे भी जाते  है 
मैदे में मिल, ओवन में पक ,रूप केक का वो पाते है 
उन्हें क्रीम से ,सजा धजा कर ,सुन्दर रूप दिया जाता है 
मगर किसी के ,जन्म दिवस पर ,उसको भी काटा जाता है 
टुकड़े टुकड़े खाया जाता ,मुंह पर कभी मल दिया जाता 
किसी सुंदरी ,के गालों का ,पा स्पर्श,बहुत इतराता 
सबकी अपनी अपनी किस्मत,मगर टूटना सबको पड़ता 
कोई ओवन,कोई तवे पर ,और पानी में कोई उबलता 
चाहे अंडा हो या इंसां , होती सबकी ,एक गति है  
सबका है क्षणभंगुर जीवन,और एक सबकी नियति है  

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
मेरी आँखें 

पता नहीं क्यों,बहुत ख़ुशी में ,पनिया जाती,मेरी आँखें 
भावों से विव्हल हो,आंसूं,,भर भर लाती,मेरी आँखें 

दुःख में तो सबकी ही आँखें,बिसुर बिसुर  रोया करती है 
अपना कोई बिछड़ता है तो ,निज धीरज खोया करती है 
खिले कमल सी सुख में ,दुःख में ,मुरझा जाती मेरी आँखें 
पता नहीं क्यों ,बहुत ख़ुशी में ,पनिया जाती ,मेरी आँखें 

कभी चमकती है चंदा सी,और लग जाता कभी ग्रहण है 
रहती है ,खोई खोई सी,जब कोई से ,मिलता मन है 
हो आनंद विभोर ,मिलन में ,मुंद मुंद  जाती,मेरी आँखें 
पता नहीं क्यों,बहुत  ख़ुशी में ,पनिया जाती,मेरी आँखें 

जब आपस में टकराती है ,तो ये प्यार किया करती है 
छा जाता है ,रंग गुलाबी ,जब अभिसार किया करती है 
झुक जाती ,जब हाँ कहने में ,है शरमाती ,मेरी आँखें 
पता नहीं क्यों ,बहुत ख़ुशी में ,पनिया जाती,मेरी आँखें 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
बूढ़ों के जज्बात 

क्या बूढ़ों के मन में कुछ जज्बात नहीं रहते 

ये सच है कि साथ समय के ,ढल जाता तन है 
पर वो ही आशिक़ मिजाज सा रहता ये मन है 
भले जवानी के दिन वाला    जोश नहीं रहता  
लेकिन फिर भी देख हुस्न को होश नहीं रहता 
मन रंगीन ,उमंगों से भर ,मचला करता  है 
जलवा अब भी हमें हुस्न का ,पगला करता है 
लेकिन कुछ कर सकने के ,हालात नहीं रहते 
क्या बूढ़ों के मन में कुछ जज्बात नहीं रहते 

हाँ,थोड़ी कम हो जाती पर भूख तो लगती है 
आँखें अब भी ,हुस्न दिखे,चोरी से तकती  है 
ये सच है कि ना रहता यौवन का जलवा  है 
साथ समय के ,सिक कर इंसां ,बनता हलवा है 
पर कोई ना चखता ,मन को बात सालती  है 
बुढ़ियायें तक भी न हमें पर घास डालती है 
वो रंगीन मिजाजी के दिन रात नहीं रहते  
क्या बूढ़ों के मन में कुछ जज्बात नहीं रहते 

सर पर अगर सफेदी छाये ,तो क्या होता है 
आँख अगर धुंधली हो जाए ,तो क्या होता है 
भले नहीं तन का मिजाज अब पहले जैसा है 
पर दिल की रंगीनी तो रंगीन हमेशा   है 
देख हुस्न को अब भी यह मन उछला करता है
लेकिन अंकलजी कहलाना ,पगला करता  है 
अच्छे दिन भी ,ज्यादा दिन तक साथ नहीं रहते 
क्या बूढ़ों के मन में कुछ जज्बात नहीं रहते 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'