Sunday, September 14, 2014

समर्पण सुख

             समर्पण सुख
फल अगर निज गर्व में ,चिपका रहेगा डाल पर,
टूट कर ना दे किसी को स्वाद तो सड़  जाएगा
पुष्प ,माला में गूथेंगा ,चढ़ेगा  भगवान पर ,
डाल पर ही रहेगा तो  बस यूं ही कुम्हलायेगा
जिंदगी की सार्थकता है समर्पण ,इसलिए ,
तू किसी को समर्पित हो और किसी के काम आ
रूप से भरपूर तुझको ,बनाया भगवान ने,
चाहता हूँ मैं तुझे ,तू बांह  मेरी ,थाम  आ
देख ले ,तू मान जा ,इसमें है तेरा  फायदा ,
सुख किसी को मिलेगा तो सफल होगी जिंदगी
यदि तुम्हारे समर्पण से ,संवरे जीवन किसी का,
इससे बढ़ कर नहीं होती है खुदा की बंदगी

मदन मोहन बाहेती'घोटू;

पतिदेव से

                 पतिदेव से 

मेरा अंग अंग मुस्काता ,रोम रोम पुलकित होता है ,
इतना  रोमांचित कर देते ,मुझको सहला सहला करके
बाहुपाश में ,ऐसा कसते ,लगता है निचोड़ दोगे  तुम,
तन में आग लगा देते हो ,रख देते हो पिघला कर के
फूलों से कोमल कपोल पर ,करते हो चुम्बन की वर्षा ,
तुम पागल से हो जाते हो,मुझको निज बाहों में भर के
प्यार तुम्हारा ,मन भाता पर ,चुभती है ,तुम्हारी दाढ़ी ,
मेरे गाल न छिल पाएंगे ,यदि आओगे ,शेविंग कर के

मदन मोहन  बाहेती 'घोटू'

मर्यादा

                          मर्यादा
भले चाँद का टुकड़ा हो तुम,परियों जैसा रूप तुम्हारा ,
लेकिन उसका नग्न प्रदर्शन ,तकलीफें देता ज्यादा है
घर की चार दिवारी में तुम,जो चाहो वो कर सकते हो,
लेकिन घर के बाहर तो कुछ ,रखनी पड़ती मर्यादा है

माना आप बहुत सुन्दर है,और काया  है कंचन जैसी
नहीं जरूरी उसे दिखाने ,घूमें बन कर, मेम  विदेशी
परिधानों में ,ढके हुए तन की अपनी सज्जा होती है
तुम्हारा व्यक्तित्व निखरता  ,आँखों में लज्जा होती है
बन शालीन ,लाजवन्ती सी,चलती हो जब नज़र झुका कर
नहीं छेड़ता ,कोई शोहदा ,तुमको सीटी बजा बजा कर
खुले वस्त्र जो तन  दरशाते  ,देते है आमंत्रण  जैसा
इसीलिये कुछ महिलाओं संग ,होता रहता ,ऐसा वैसा
अपना रूप प्रदर्शित करने  के कितने ही मौके  आते
उसे लुभाओ ,जो तुम्हारे ,प्रीतम है,पतिदेव   कहाते

रूप अगर शालीन,लजीला ,जैसे सोना और सुहागा ,
खुद आगे बढ़ ,बोला करता,चाहे कितना ही सादा है
घर की चार दिवारी में तुम ,जो चाहे वो कर सकते हो,
लेकिन घर के बाहर तो कुछ ,रखनी पड़ती ,मर्यादा है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

अब तुमसे क्या मांगूं ?

             अब तुमसे क्या  मांगूं ?

इतना कुछ दे दिया आपने ,बोलो अब तुमसे क्या मांगूं ?

तुम मेरे जीवन में आये ,ज्यों मरुथल में जल की धारा
सूख रहे मन तरु को सिंचित करने बरसा प्यार तुम्हारा
तुमने दिया मुझे नवजीवन ,सूने मन में प्रीत जगाई
टिम टिम  करते बुझते  दीपक में आशा  की ज्योत जगाई
बस जीवन भर बंधा  रहूँ  मैं,इस बंधन में,कहीं न भागूं 
इतना  कुछ दे दिया आपने,बोलो अब तुमसे क्या मांगूं ?

मेरी अंधियारी  रातों में ,बनी चांदनी छिटक गयी तुम
तरु सा मैं तो मौन खड़ा था,  एक लता सी,लिपट गयी  तुम
तन का रोम रोम मुस्काया ,तुमने  इतनी प्रीत जगा दी
मैं पत्थर था,पिघल  गया हूँ ,तुमने ऐसी  आग लगा दी
आओ बाहुपाश में बंध  कर ,तुम भी जागो,मैं भी जागूँ
इतना कुछ दे दिया आपने ,बोलो अब तुमसे क्या मांगूं?

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '