Sunday, August 23, 2015

औरतें

            औरतें
              १
औरतें,
हवा सी होती है ,
कभी चिलचिलाती सर्द
कभी लू की तरह गर्म
कभी बसंती बयार बन कर
प्यार से सहलाती है
कभी नाराज होती है
तो तूफ़ान बन कर ,
तहस नहस मचाती  है 
             २
औरतें,
बदली सी होती है
पुरुष की समंदर सी
 शक्शियत को ,
अपने प्यार की गर्मी से ,
आसमान में उडा कर,
अपने में ,
समाहित लेती है कर
फिर मन मर्जी के मुताबिक़ ,
डोलती है इधर,उधर
कभी बिजली सी कड़कती है,
कभी गरजाती है
कभी मंद मंद फुहार सी बरस ,
मन को हर्षाती है
                ३
औरतें ,
चन्दन सी होती है
खुद घिस घिस जाती है
और आदमी के मस्तक पर चढ़ ,
शीतलता देती है,
जीवन महकाती है
                ४
औरतें,
मेंहदी सी होती है,
हरी भरी ,लहलहाती
जब आदमी के जीवन में आती,
तो कुट कर,पिस कर,
अपना व्यक्तित्व खोकर ,
हमारे हाथों को रचाती है
जीवन में रंगीनियाँ लाती है
              ५
औरतें,
नदिया सी होती है ,
लहराती,बल खाती
अक्सर,पीहर और ससुराल के,
दो किनारों के बीच ,
अपनी सीमा में रह कर बहती है
और कल,कल करती हुई,
अपने प्यार के वादों को,
कल पर टालती रहती है
                 ६
औरतें,
प्रेशर कुकर की तरह होती है ,
जिसमे बंद होकर जब आदमी,
 गृहस्थी के चूल्हे पर चढ़ जाता है
तो उसके दबाब से ,
सख्त से सख्त आदमी का मिजाज़ भी ,
चावल दाल की तरह ,
नरम पड़ जाता है
                   ७
औरतें,
बिजली सी होती है
घर को  चमकाती है
 घर की साफसफाई भी करती है,
और खाना भी पकाती है
मौसम और मूड के अनुसार ,
घर को ठंडा या गर्म भी कर देती है
और गलती से छू लो ,
तो झटका भी देती है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'                          

वर्षा का पानी

           वर्षा का पानी

बरस बरस वर्षा का पानी ,सबके मन को हर्षाता है
पर जब शैतानी पर आता ,तो सड़कों पर भर जाता है   
नन्हे नन्हे छोटे बच्चे ,जब उसमे छप छप करते है,
भरते निश्छल सी किलकारी,तो उसको प्यारे लगते है
वो जब खुश हो भीगा करते ,इसका मन भी मुस्काता है
बरस बरस वर्षा का पानी,सबके मन को  हर्षाता  है
कई सुंदरी और सुमुखियां,संभल संभल कर आती,जाती
अपने वस्त्रों को ऊँचा कर,निज पिंडली दर्शन करवाती
नारी तन स्पर्श उसे जब मिलता ,पागल  हो जाता है
बरस बरस वर्षा का पानी ,सबके मन को हर्षाता है
कुछ मंहगे ,गर्वीले वाहन,तेज गति से है जब आते
कोशिश करते ,करें पार हम ,आसपास छींटे उड़वाते
बेचारे ठप होते जब ये ,साइलेंसर में घुस जाता  है
बरस बरस वर्षा का पानी सबके मन को हर्षाता है
बरसा करता जब ऊपर से ,मानव छतरी ले बचता है
पर सड़कों पर बच ना पाता ,वो नंगे पैरों चलता है
तरह तरह के देख नज़ारे ,उसको बड़ा मज़ा आता है
बरस बरस वर्षा का पानी ,सबके मन को हर्षाता है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

चार दिन

                     चार दिन
 
चार दिनों के लिये चांदनी ,फिर अंधियारा ,
               यही सिलसिला पूरे जीवन भर चलता है
उमर चार दिन लाये ,दो दिन करी आरज़ू ,
                बाकी दो दिन इन्तजार की व्याकुलता  है
चार दिनों के लिए ,अचानक पति देवता,
                जाय अकेले ,कहीं घूमने ,ना खलता है
चार दिनों तक छुट्टी करले,अगर न आये ,
                बाई कामवाली तो काम नहीं चलता है

घोटू