Thursday, August 1, 2019




कबूतरों से

हे प्रेम के प्रतीक परिंदों !
अपनी चमकती गर्दन को मटका कर ,
तुम्हारे प्रेमप्रदर्शन का अंदाज
सचमुच है लाजबाब
तुम्हे अपनी प्रेमिका के साथ
गुटरगूँ करते हुए देख कर ,
कितने ही नवप्रेमी ,भावुक हो जाते है
प्रेमशास्त्र का पहला  अध्याय सीख कर ,
एक दूसरे में खो जाते है

हे आँख मटक्का करते हुये आशिकों !
तुम तो हो मोहब्बत के फ़रिश्ते
हर तीसरे चौथे दिन किसी नई कबूतरनी संग ,
जोड़ लिया करते हो रिश्ते
और घर की मुंडेरों पर हो नज़र आते
उनके संग इश्क़ लड़ाते
खुले आम ,सामने सारे जहाँ के
हमें भी बता दो
लड़की पटाने का ये हुनर ,
तुमने सीखा है कहाँ से

हे मुकद्दर के सिकंदरों !
तुमने मेहरुन्निसा के हाथो से उड़ ,
उसका मुकद्दर चमका दिया
और एक दिन  उसे नूरजहां बना दिया
वैसी ही तक़दीर हमारी भी चमका दो
किसी बड़ी हस्ती का ,
लख्तेजिगर बनवादो

हे चापलूस चुहलबाजों !
तुम अक्सर
आते हो नज़र
'हाँ 'कहनेवाली मुद्रा में ,
गर्दन हिलाते हुए ,
ऊपर से नीचे ,नीचे से ऊपर
दाएं बाए गरदन हिलाकर ,
कभी भी नहीं करते हो नाहीं
क्या इसी तरह हर बात में हाँ कह कर ही ,
 लड़की जाती है पटाई

हे गगन बिहारी प्रेमियों !
तुम्हारा दिशाज्ञान
सचमुच है महान
तुम्हे कितना ही छोड़ दो खुला
पर जैसे ही दिन ढला
तुम आज्ञाकारी पतियों की तरह ,
लौट कर ,सीधे आ जाते हो घर
और बन जाते हो लोटन कबूतर

हे प्रेमसन्देश के वाहकों !
एक जमाने में  प्रेमिकाएं ,
अपने पहले प्यार की पहली चिट्ठी
तुम्हारे माध्यम से भिजवाती थी
और कबूतर जा जा गाना जाती थी
लेकिन तुम खुद तो ,
कभी प्रेम संदेशा भिजवाने की ,
नौबत ही नहीं आने देते हो
गुटरगूँ करते हुए ,गरदन मटका कर ही
कबूतरनी को पटा  लेते हो

हे शांति के दूतों !
तुम्हारे श्वेतवर्णी भाइयों को ,
शांति का प्रतीक मान कर लोग है उड़ाते
पर तुम शांति से बैठे हुए ,
कभी भी हो नज़र नहीं आते
हमेशा देखा है तुम्हे व्यस्त ,
किसी न किसी  कबूतरनी के साथ ,
टांका बिठाते

हे कुलबुलाते हुए कपोतों !
तुम भी आजकल के कपूतों की तरह ,
उड़ना सीख लेने पर
चले जाते हो अपने माँ बाप को छोड़कर
अपना अलग घर बसा लेते हो
उनके प्यार और त्याग का ,
क्या यही सिला देता हो

हे पंख फड़फड़ाते हुए फटेहाल फक्कड़ों !
क्या तुम्हे इश्क़ लड़ाने के लिए ,
मिलती है मेरी ही गैलरी
ले आते हो रोज एक नयी कबूतरी
देख कर तुम्हारी ये खुशनसीबी
मुझे होने लगता है अहसासेकमतरी
मैं द्वेष से जला जा रहा हूँ
कितने ही वर्षों से ,
एक ही कबूतरी से काम चला रहा हूँ  
तुम दिखने में इतने सीधे सादे हो
पर क्या सचमुच ही वैसे हो जैसे दिखते हो
मुझे तो तुम आवारा प्रेमी लगते हो
कभी भी  एक जगह नहीं टिकते हो
कहाँ से लाये हो ऐसा मुकद्दर
इ मेरे कलाबाज कबूतर !
 
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '