Tuesday, May 31, 2011

मै परेशां हूँ मुझे और परेशां न करो

मै परेशां हूँ मुझे और परेशां न करो
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दाम पेट्रोल के बद्गते है हरेक महीने में
दाम डीजल के भी तुम ऐसे बढाया न करो
गैस के दाम भी बढ़ जायेंगे ,ये खबर सुना
  धधकते दिल को हमारे यूं जलाया न करो
बढ़ेंगे दम ढुलाई के,किराए बस के,
इस तरह रोज ही महंगाई बढाया न करो
         मै परेशां हूँ,मुझे और परेशां न करो
न तो  कानून की है कोई व्यवस्था अच्छी,
हमारा चैनो अमन ऐसे चुराया न करो
लुट रहे घोटालों में ,लाखों ,करोड़ों रूपये
देश का पैसा विदेशो में भिजाया न करो
हमने ही तुमको जिताया हमारे वोटों से
आज पावर में हो तो हमको सताया न करो
            मै परेशां हूँ मुझे और परेशां न करो
मदन मोहन बहेती 'घोटू'


'मै'

जब मानव है कुछ पा जाता
और यदि उसमे 'मै' आ जाता
वह इतराता
'मै ' का गरूर
  मय
के सरूर से ,
कई गुना होता है मादक
' मै' आने पर ,
लायक से लायक भी बन जाते नालायक
'मै',मय,माया,
बहुत नशीले ये होते है
माया का मय पी लेने पर
मन में बस मै ही मै छाता
'मै' तो है अपनों का बैरी ,उन्हें भुलाता
इतना आत्मकेन्द्रित हो जाता है मानव,
सिमटा रहता एक कक्ष में
जिस में लगे हुए होते हर तरफ आईने
और नज़र आता है अक्स स्वयं का केवल,
सभी तरफ होता मै ही मै
वृक्षों में जब फल लगते है,
कहता वृक्ष लगाये मैंने
मगर जड़ों को वह बिसराता
बोकर बीज ,सींच कर किसने बड़ा किया है ,
याद न आता
'मै' हूँ,हम है
बड़ा अहम् है
मै और मेरा कुछ ना रहता,सिर्फ बहम है
क्योंकि साथ नहीं कुछ जाता
मेरी मानो
मै को पास पटखने मत दो
क्योकि तुम में,अगर नहीं मै
प्रेम भाव है और समर्पण
तभी सफल होता है जीवन
हे मेरे प्रभु!
मेरे सब 'मै' को हर ले तू
मेरे मन में बसा रहे बस एक तू हो तू

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

'

Sunday, May 29, 2011

गधे का अंतर्द्वंद

गधे का अंतर्द्वंद
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इस धूप भरी दोपहरी में,उस पीपल के तरु के नीचे
वो कौन तपस्वी खड़ा हुआ है मौन ,शांत,आँखें मीचे
लाल रेत पर,तीन पैर पर,खड़ा हुआ काया साधे
नयन निराले सुन्दर हैं,रह रह खुलते,आधे आधे
कितना बुजुर्ग है यह साधू,चांदी से बाल हुए सारे
शोभा उसकी बढ़ा रहे है,उसके कान बड़े प्यारे
देवदूत सा लगता है,उजला तन है,उजला मन है
लोभ,मोह से बचने को ,पैरों में पगहा बंधन है
कई कीट,कितने मच्छर,तुन तुन करते,बाधा डाले
पर ध्यान न उसका तोड़ सके,कितने प्रयत्न ही कर डाले
जनहित ही इसने जन्म लिया ,यह सेवाव्रती,धीर प्राणी
कितना परोपकारी है ये,कितना बलवान वीर प्राणी
कितने ही जुलम हुए उस पर,पर सहनशील ने सभी सहा
पर सहनशीलता ,सेवा पर ,लोगों ने उसको गधा कहा
वह सोच रहा है खड़ा खड़ा,है कैसी रीत जमाने की
सब को तो बस आज पड़ी है,अपना काम बनाने की
सब अपने में ही मस्त,दर्द औरों का कोई क्या जाने
है नहीं जोहरी कोई जो ,मुझसे हीरे को पहचाने
लिफ्ट न मुझको मिलती,कितनी लिफ्ट किया करता हूँ मै
लेबर की डिगनिटी में,विश्वास किया करता हूँ मै
लेकिन अपने श्रम की कीमत,मै क्या पाता हूँ बेचारा 
दो,चार,पांच,डंडो के संग,कुछ भूसा,कुछ सूखा चारा
 नाम बहुत है लेकिन कुछ भी,पूछ नहीं है लेबर की
इसीलिए तो कद्र नहीं,मुझसे श्रमशील जानवर की
मुझको अब तक जान न पायी,जनता कितनी बेसुध है
मै नेता हूँ,मुझमे नेतागिरी का हर गुण मौजूद है
मेरी आवाज बुलंद बहुत,जो जन जन तक है जा सकती
नयी क्रांति फूंक सकेगी,नया सवेरा ला सकती
सहनशील मै नेता सा,मेरे कितने आलोचक है
 खड़े कान है टोपी से ,जो नेतागिरी के सूचक है
मुझे पुराणों ने भी माना,बात पुरानी,युग त्रेता
लंका के राजा रावण का,भाई था मै खर नेता
राजनीती का  चतुर खिलाड़ी,देखे कई रंग मैंने
सेनापति बन युद्ध किया था,अरे राम के संग मैंने
मुझे याद है बुरी तरह से,मैंने उन्हें खदेड़ा था
बन्दर सब डर कर भागे जब चींपों का स्वर छेड़ा था
सारी दुनिया जान गयी थी,वीर बहुत हूँ सुन्दर मै
और डिफेन्स के लिए एक ही हूँ उपयुक्त मिनिस्टर मै
कलाकार हूँ,कविता करना भी तो मेरे गुण में है
कितनी प्रयोगवादी कविता,मेरी चींपों की धुन में है
बड़े से बड़ा कवि भी मेरे आगे घुटने टेक रहा
नहीं समझ में कविता आती ,तो कहता मै रेंक रहा
मै गायक हूँ,गीत सुना  कर,सबका मन बहलाता हूँ
मंत्रमुग्ध सब हो जाते जब अष्ठम स्वर में गाता हूँ
 और खिलाडी,मत पूंछो,मुझको बोक्सिंग का शौक लगा
  मेरी दुलत्तियों के आगे,कोई ना मुझसे जीत सका
 मेरी गदही का दूध बहुत,पोषक,सौन्दर्य प्रसाधक है
बजन और मोटापा कम ,करने में बड़ा सहायक है
मै क्या हूँ,कितना अच्छा,पूछो धोबी,कुम्हारों से
कितनी बड़ी मुसीबत मैंने दूर करी बेचारों से
वे बहुत दुखी थे बेचारे,मैंने उन पर उपकार किया
उनके दुःख दूर किये मैंने,बोझा ढोना स्वीकार किया
 मेरी देवी ने कद्र करी,सचमुच मै कितना पावन हूँ
जिनकी सब पूजा करते है,मै शीतला माँ का वाहन हूँ
मोरमुकुट से कान खड़े है,मै भी तो अवतारी हूँ
विष्णु चारभुज धारी है,मै किन्तु चार पग धारी हूँ
शंकर के सर पर एक चन्द्र,मेरे सर पर दो चाँद जड़े
वह एक आह ठंडी भर कर,धीरे से रेंका खड़े खड़े
वह सोच रहा था बेचारा,मेरी किस्मत भी रंग लाये
शांति और सेवा का नोबल प्राईज मुझको मिल जाये
इतने में गरम गरम लू का,एक हल्का सा झोंका आया
साज सजे ,सुर मिले सभी,चींपों कर गदहा चिल्लाया
 चींपों,चींपों,चींपों,चींपों,मै  जाग  गया दुनिया वालों
मै क्रांति मचा दूंगा जग में,अब भी संभलो,देखो,भलो
फिर किया दंडवत भगवन को,वो लगा लोटने ढेरी में
अंगों में रमी भभूति फिर,उस धूप भरी दोपहरी में

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

बँटी हुई माँ

बँटी हुई  माँ
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जिसने बांटा
प्यार बराबर सब बेटों में
आज बँट रही वो माँ अपने ही बेटों में
अब बूढी हो गयी अकेली है ,अशक्त है
भूख नहीं लगती,खाने से मन विरक्त है
दस बारह गोली दवाई की नित खाती है
मिनिट मिनिट में बात भूलती,बिसराती है
कमर झुक गयी ,होती है चलने में दिक्कत
मन ना लगता सुनने में अब कथा ,भागवत
दूर गाँव में खाली पड़ी,हवेली उसकी
बची नहीं पर कोई सखी,सहेली उसकी
ख्याल हमेशा जो रखती रहती हम सबका
पर कुछ करना,नहीं रहा अब उसके बस का
अब आश्रित है बेटों पर,कुछ ना कहती है
थोड़े थोड़े दिन  हर एक के घर रहती है
अब भी प्यार लुटाती है ,बेटी बेटों में
आज बँट रही वो माँ अपने ही बेटों में

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

भरा हुआ घर

भरा हुआ घर
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मेरे मन के स्मृतिपटल पर,
अक्सर छा जाया करता है ,
बचपन का परिवार हमारा
भरा पूरा घर बार हमारा
दादी थी ,माँ,बाबूजी थे,
और सात हम भाई बहन थे
इक दूजे संग पीते खाते
लड़ते ,भिड़ते,हँसते, गाते
इतने बच्चे,इतनी रौनक,
मेहमान भी आते ,जाते
जल्दी उठ कर सुबह, सवेरे
कम काज में माँ लगती थी
झाड़ू,पोंछा,कपडे ,बर्तन
सबके लिए पकाती भोजन
लकड़ी और कंडों से तब जलता था चूल्हा
वो चौके में बैठ पकाती  दाल,सब्जियां
और सब बच्चे ,लाइन लगा बैठ जाते थे
थाली के नीचे रख कर कंडे का टेका
दल और सब्जी पुरसी जाती थाली में,
एक एक कर रोटी बनती ,
और नंबर से हम खाते थे
माँ के हाथ बनी उस रोटी और सब्जी में
सचमुच स्वाद गजब आता था
और शाम को,यही सिलसिला चल जाता था
करती दिन भर काम रात तक,
 माँ होगी कितनी थक जाती
किन्तु हमें कर तृप्त ,तृप्ति जो ,माँ की आँखों में थी आती
मुझे याद है
माँ ,बाबूजी सोते थे अपने कमरे में
और रात को ,लगती बिस्तर की लाइन ओसारे में
या गर्मी में  छत के ऊपर
हम सब बच्चे,
सुनते थे दादी से किस्से
कभी खेलते अन्ताक्षरी थे
वो क्या दिन थे
इतने बच्चे,
पर सब अनुशासन में रहते थे
इक दूजे का होमवर्क  निपटा देते थे
बड़े भाई की सभी किताबें ,
काम आ जाती थी छोटों के
और बड़ों के छोटे कपडे,
खुश हो पहन लिया करते थे
साथ उम्र के बड़े हुए हम
शादी करके सब बहने ससुराल गयी और,
हम सब भाई व्यस्त हुए अपने धंधों में
इधर उधर जा तितर बितर परिवार हो गया
हम बच्चों ने,
तब सचमुच जीया था बचपन
ना था इतना कोम्पीटीशन,न ही टेंशन
और आज मै,व्यस्त जॉब में
पत्नी भी सर्विस करती है,बहुत व्यस्त है
बच्चे होमवर्क में उलझे,या टी वी में हुए मस्त है
भूख लगे तो ,डोमिनो से,
एक पीज़ा मंगवा लेते है
सिर्फ एक सन्डे के दिन मिलजुल खाते है
अब एकल परिवार हो गए ,
जीवन पध्दिती में आया है कितना अंतर
पर मैंने जीया,भोगा है ,भरा हुआ घर

मदन मोहन बहेती 'घोटू'





होती गर जो मोबाईल मै

होती गर जो मोबाईल मै
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मेरे प्रीतम ,होती गर जो मोबाईल मै
बस ,बस कर ही रह जाती,तुम्हारे दिल में
तुम्हारे प्यारे हाथों में सिमटी रहती
होठों  से और गालों से बस चिपकी रहती
होता जब भी मेरे मन में वाइब्रेशन
तो झट से अपने हाथों में ले लेते तुम
मै खुश  रहती इसी आस में
सोवोगे रख मुझे पास में
और जब मेरी घंटी बजती
मै तुम्हारे होठों लगती
तुम मुस्काते
घंटों मुझसे करते बातें
छूकर टच स्क्रीन ,मुझे जब टच तुम करते
मुख पर कितने भाव उमड़ते
'सेमसंग' की तरह सदा मै रहती संग में
'स्पाइस' की तरह चटपटी रहती मन में
नहीं दूसरा 'सिम' ,आने देती जीवन में
और मोबाईल होने पर भी,
साथ तुम्हारे हरदम टिकती
तुम्हारी महिला मित्रों के,
सारे एस एम एस  तुम्हारे
सबसे पहले मुझको मिलते,
मै उनको डिलीट कर देती बस एक पल में
मेरे प्रीतम ,होती गर जो मोबाईल मै

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Friday, May 27, 2011

फसल- कथावाचक संतों की

नयी उम्र की नयी फसल तो ,
हर युग में पैदा होती है,
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से,
बुरी तरह से विकस रही है,
फसल कथावाचक  संतों की
हर मंदिर में ,हर तीरथ में,
और टी वी की कुछ चेनल में
नज़र कोई पंडित जी आते
कथा, भागवत गान सुनाते
उसमे भी आधे से ज्यादा
टाइम भजन ,कीर्तन गाते
बड़े भव्य से पंडालों में
कथा भागवत ये करते है
 और कथा में भी कमाई का,
जरिया ढूंढ लिया करते है
व्यासपीठ से बतलायेंगे
कल प्रसंग रुक्मणी विवाह का ,
जिनने खुद का हरण करा कर,
श्री कृष्णा से ब्याह रचाया
कन्यादान रसम में उनको,
इसीलिए कुछ ना मिल पाया 
इसीलिए रुक्मणी विवाह में,
जो भी श्रोता,
वस्त्राभूषण दान करेगा
उसको काफी पुण्य मिलेगा
कथा सुदामा की होगी  तो बतलायेगे
भक्त सुदामा मुट्ठी भर चावल लाये थे,
प्रतिफल में प्रभु ने कितना एश्वर्य दे दिया
जो श्रोता श्रीकृष्णा को चावल लायेगे
प्रभु कृपा से ,वो धन और दौलत पायेगे
और पुण्य के लोभी श्रोता,
इक दूजे की प्रतिस्पर्धा में
खुले हाथ से दान चढाते
और पंडितजी के भंडारे भरते जाते
बहुत लाभदायक ये धंधा,
इसमें इज्जत है, दौलत है,
बहुत नाम है और शोहरत है
कई बार मै सोचा करता,
कथा भागवत की है वो ही,
लेकिन बार बार सुनने को
इतनी भीड़ उमड़ती क्यों है?
किया विवेचन तो ये जाना,
कुछ संताने
मात पिता को भिजवाती है,
कथा भागवत की सुन कर के पुण्य कमाने
इसी बहाने,
थोड़े दिन तक बच जाते सुनने से ताने
और मिल जाती
कुछ दिन अपने ढंग से जीने की आजादी
और ऐसी ही सोच बुजुर्गों में भी होती,
वे भी खुद को,
रंगते कथा भागवत रंग से
थोड़े दिन तक ,जीवन जीते अपने ढंग से
इसीलिए ऐसे आयोजन में जनता उमड़ी आती है
और हर दिन फल फूल रहा है,
धंधा इन सब नव संतों का

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Wednesday, May 25, 2011

पौ फटी

 पौ  फटी
कलियाँ चटकी
भ्रमरों के गुंजन स्वर
महके
डाल डाल पर पंछी
चहके
गौ रम्भाई
मंदिर से घंटा ध्वनि आई
शंखनाद भी दिया सुनाई
मंद समीरण के झोंको ने आ थपकाया
प्रकृति ने कितने ही स्वर से मुझे जगाया
लेकिन मेरी नींद  न टूटी
किन्तु फ़ोन की एक घंटी से मैं जग बैठा
कितना भौतिक
मुझको है धिक्

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

थकान का सुख

थकान का सुख
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थकान,
है एक शारीरिक स्तिथि
और सुख ,
एक मानसिक अनुभूति
थकान का भी एक सुख होता है
जिसका स्वाद,
गूंगे के गुड की तरह,
बिना थके प्राप्त नहीं होता
जो सुख थके हुए रही को,
मंजिल पर पहुँचने पर,
या दिन भर के  परिश्रम के बाद,
मजदूरी मिलने पर,
पति पत्नी के मधुर संबंधों में,
या प्रसव के बाद,
नवजात शिशु को देख कर
माँ की आँखों में झलकता है
वो थकान का सुख ही तो है,
जिसमे संतोष छलकता है
जो लोग बिना थके सुख पाते है
जल्दी ही,सुख से थक जाते है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

धंधा -बाबागिरी का

     धंधा -बाबागिरी  का
   -----------------------
नहीं नौकरी ,पढ़े लिखे हो ,है बेकारी
तो फिर तुमको ,सच्ची,अच्छी,राय हमारी
बहुत धर्मप्रिय है जनता ,तुम लाभ उठाओ
छोडो सारे चक्कर ,तुम बाबा बन जाओ
सभी सफलताओं का फिर तो द्वार खुला है
बाबाजी बनने का सिंपल फ़ॉर्मूला है
संस्कृत के दो चार मन्त्र पहले रट डालो
और गले में रुद्राक्षों की माला डालो
सिर मुंडवालो,या फिर लम्बे बाल बढाओ
भगवा सा चोला पहनो,सिर तिलक लगाओ
एक मूर्ती,कुछ तस्वीरें,भजन ,कीर्तन
घंटी,पूजा,चेला,चेली,कुछ अपने जन
बने प्रचारक,करें आपकी ,महिमा मंडित
और आपको बतलाएं ,अति ज्ञानी पंडित
अच्चा होगा ,कुछ ज्योतिष का ज्ञान जरूरी
और हस्त रेखाओं की पहचान जरूरी
कुछ ड्रामेबाजी आती हो ,थोडा गाना
सबसे ज्यादा आवश्यक है ,बात बनाना
तो भक्तों की भीड़ नहीं बिलकुल थमने की
सभी योग्यताएं है तुम में बाबा बनने की
,पुत्र चाहिए,बाबाजी के आश्रम आओ
परेशानियाँ,चिंताओं से मुक्ति पाओ
नयी नौकरी,या मनचाहा जीवन साथी
होंगे पूर्ण मनोरथ,कृपा अगर बाबा की
तुम भविष्य बतलाओगे जितने लोगों का
प्रोबेलिटी है,सच होगा ,आधे लोगों का
उतने निश्चित भक्त तुम्हारे बन जायेंगे
हो मुरीद,कितने ही भक्तों को लायेंगे
बाबा गिरी का धंधा फिर बस चल निकलेगा
दिन दूना और रात चौगुना नाम बढेगा
शोहरत,दौलत,सब चूमेगी,कदम तुम्हारे
हो जायेगे,बस तुम्हारे,वारे न्यारे
बाबा गिरी में ,ख्याल मगर तुम ,इतना रखना
गिरी हुई हरकत करने से ,बिलकुल बचना
अगर गए जो पकडे तुम जो किसी खेल में
बदनामी होगी और जीवन कटे जेल में

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

हंसी खो गयी

  हंसी खो गयी
   --------------
जंजालों में जीवन के इस कदर फंसे है
अरसा बीता,हम खुल कर के नहीं हँसे है
थे बचपन के  दिन वो कितने सुन्दर ,प्यारे
किलकारी गूंजा करती थी ,घर में सारे
खेल कूद,खाना पीना और पढना,लिखना
था आनंद बसा जीवन में हर पल कितना
आई जवानी प्यार हुआ तुमसे जब गहरा
आती थी मुस्कान देख तुम्हारा चेहरा
मन में मोहक छवि तुम्हारी ,सिर्फ बसी थी
जीवन में बस प्रेम भरा था ,हंसी ख़ुशी थी
और फिर ऐसा दौर आया ,मेरे जीवन में
दब कर ही रह गयी सभी खुशियाँ इस मन में
परेशानियाँ,चिंताओं ने ऐसा घेरा
दूर हुई सारी खुशियाँ,रह गया अँधेरा
कभी बिमारी ,कभी उधारी,कोर्ट,मुकदमा
कभी टूटना दिल का या लग जाना सदमा
चिंताओं में डूबे रहतें हैं हम सब की
जाने कहाँ ,हो गयी गम मुस्कानें लब की
और शिकंजा ,परेशानियाँ,खड़ी कसे है
अरसा बीता,हमको,खुल कर नहीं हंसें है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

फूल खिले मेरे जीवन में

फूल खिले मेरे जीवन में
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जब से तुम आई जीवन में फूल खिल गए
मेरे सोये अरमानो को पंख मिल गए
सूखी थी जीवन बगिया ,गुलजार हो गयी
जीवन में सतरंगों की बोछार हो गयी
थी गर्मी की तपन,कभी सर्दी की ठिठुरन
मेरे मन को चुभते रहते थे सब मौसम
तुम जब आई वासंती मधुमास आगया
मेरे जीवन, सांसों में उच्छ्वास आगया
फूल खिले जीवन बगिया में ,मै हूँ,तू है
और प्यार की ,सभी तरफ फैली खुशबू है

मदन मोहन बहेती'घोटू'

Tuesday, May 24, 2011

देखना है बदल तुम कितना गयी हो

देखना है बदल तुम कितना गयी हो
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कभी बचपन में पढ़े हम साथ में थे
खूब खेले हाथ लेकर हाथ में थे
तुमसे मिलने की बड़ी ही तमन्ना है,
देखना है बदल तुम कितना गयी हो ?
क्या तुम्हारे गाल है अब भी गुलाबी,
क्या तुम्हारे बाल अब भी रेशमी है
क्या चमक है आँख में अब भी तुम्हारे,
शरारत में आई क्या कोई कमी है
क्या बची है वही चंचलता तुम्हारी
और हँसना,खिलखिला ताली बजाना
जीत जाने पर ख़ुशी से नाच उठाना,
हार जाने पर मचल कर रूठ जाना
खेल में जो कहीं गिर जाती कभी तुम,
संभल कहती मुझे कुछ भी ना हुआ है
जिंदगी की दोड़ में संभली गिरी हो
वही जज्बा क्या अभी तक बच रहा है
क्या अभी भी बचा तुममे वही बचपन,
या कि फिर परिपक्व सी तुम हो गयी हो
  देखना है बदल तुम कितना गयी हो ?
सुना है कि बेवफा इस जमाने ने,
बुरे ,अच्छे सब तरह के दिन दिखाए
जिंदगी कि डगर पर तुम डगमगाई
थे तुम्हारे कदम थोड़े  लडखडाये
है कई तूफ़ान आये जिन्दगी में,
दिक्कतों और मुश्किलों से तुम लड़ी हो
कई झंझावत पड़े है  झेलने   पर,
आज भी तुम सुदृढ़ हो कर के खड़ी हो
इस तरह तप कर समय कि आग में फिर,
किस तरह व्यक्तित्व निखरा है तुम्हारा
एक भोली और नन्ही सी कली ने,
वक्त के संग किस तरह खुद को सवांरा
है पुराना सा वही आलम तुम्हारा,
या कि सांचे में नए तुम ढल गयी हो
देखना है बदल तुम कितना गयी हो?

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

introduction

<div class="separator" style="clear: both; text-align: center;">
<a href="http://1.bp.blogspot.com/-rmlQCNspsF4/Tbzv5_SbNGI/AAAAAAAAAD0/g__ptpCRJoU/s1600/DSC_0572a_copy.GIF" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"><img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/-rmlQCNspsF4/Tbzv5_SbNGI/AAAAAAAAAD0/g__ptpCRJoU/s320/DSC_0572a_copy.GIF" width="221" /></a></div>



<b><span class="Apple-style-span" style="color: #38761d;">कवि परिचय:-</span></b>
<b>मदन मोहन बाहेती 'घोटू'</b>
<b>Bsc मेकनिकल इंजीनियरिंग BHU </b>
<b><span class="Apple-style-span" style="color: magenta;">प्रकाशित पुस्तकें:-</span></b>
<b>१ - साडी और दाढ़ी</b>
<b>२ - बुढापा</b>
<b>नोएडा में स्वयं का उद्योग</b>
<b><span class="Apple-style-span" style="color: blue;">मोबाईल नंबर:-</span> 09350805355</b></div>
intro

Monday, May 23, 2011

कैसे कैसे लोग


कैसे कैसे लोग
------------------
यह ऐसा है ,वह वैसा है
उसके बारे में मत पूछो,वह कैसा है
सदा चार की बातें करनेवाले,
     जब सदाचार की  बातें करते है
            तो कैसे लगते है?
कुछ विष इसके खिलाफ उगला
कुछ विष उसके खिलाफ उगला
जब जब जिसकी भी बात चली,
कुछ विष उसके खिलाफ उगला
  साँस साँस में जिसके विष का वास रहे
      वो विश्वास की बातें करते है
            तो कैसे लगते है?
जरुरत पर इसके चरण छुए
मतलब पर उसके चरण छुए
जब जब भी जिससे काम पड़ा
हरदम बस उसके चरण छुए
    सदा चरण छूने वाले कुछ चमचे
       जब सदाचरण की  बातें करते है
           तो कैसे लगते है?
मदन मोहन बहेती 'घोटू'

हंसों का जोड़ा

हंसों का जोड़ा
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मुझे एक हंसों का जोड़ा मिला
शुरू हुआ बातों का सिलसिला
मै बोला आप  तो काफी गुनी है
आपकी बहुत तारीफ़ सुनी है
आप तो मान सरोवर में रहते है
दूध का ढूध और पानी का पानी कर देते है
सिफ मोती खाते है
वर्ना भूखे रह जाते है
इस महंगाई के जमाने में
आप रोज मोती कैसे अफोर्ड करते है खाने में
बात सुन मेरी, दोनों हँसे और बोले
भाई साहब ,आप तो है बिलकुल भोले
दिखने में तो समझदार नज़र आते है
कैसी कैसी बातों पर विश्वास कर जाते है
अरे बिना पानी के दूध,दूध नहीं,खोया कहलाता है
या फिर मिल्क पावडर बन जाता है
बिना पानी के मोती या मानस नहीं उबरता है
वेसे ही बिना पानी के दूध,दूध नहीं रहता है
और मोती मानसरोवर में नहीं मिलते है
वो तो समंदर की सीपियों में पलते है
हंसिनी फिर मुस्काई
और बोली कि भाई
हम न तो हिमालय से है,न स्वर्ग से है
हम तो बस बुद्धि जीवी है,मध्यमवर्ग से है
हम दूध का दूध पानी का पानी नहीं करते है
बल्कि थोडा सा दूध जो भी खरीद पाते है
उसी में पानी मिला,पानी का दूध करते है
उसी से बच्चों का पेट भरते है
और भाई साहब
रही मोती कि बात,
हमने असली मोती छूकर भी नहीं देखे है,खाना तो दूर है
हाँ,चुगने कि बात में तथ्य जरूर है
 राशन के गेंहू में इतने कंकर मिलते है
हम कंकर नहीं, गेहूं ही चुनते है
गेहूं ही हमारे मोती है
जिससे बनती रोटी है
हंस भी हंसा और बोला,
आपको शायद गलत फहमी हो गयी है
हम सफ़ेद हंस है,सफेदपोश नेता नहीं है
वो जरूर रोज रोज मोती अफोर्ड कर सकते है
मोतीचूर खाते है ,मोती भस्म चखते है
वो ही है वो ज्ञानी
जो दूध कि मलाई खुद चट कर जाते है
और जनता को मिलता है दुधिया पानी
हमें खुसी है कि हम उनके जैसे नहीं है
बाहर से जैसे है भीतर भी वही है  
न काला धधा  करते है,न काला पैसा है
हमारा उजला तन है,और मन भी वैसा है
आपने एक बात मगर सच कही है
कि हम मान सरोवर में रहते है,
हाँ हमारा घर वही है
हमने अभी तक अपना मान बचा रख्खा है
इमान बचा रख्खा है
सन्मान बचा रख्खा है
इसीलिए अभी तक मोती नहीं चख्खा है
हम मान के सरोवर में रहते है
पसीने के मोती चुगते है
बुद्धिजीवी है,सरस्वती के वाहन है,
ज्ञान के पंखो से उड़ते है
अच्छा,देर हो रही है हम चलते है
कहीं,हमारा बच्चा भूखा सो ना जाये
या बगुलों की भीड़ में कही खो ना जाये

मदन मोहन बहेती'घोटू'

हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है

हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है
----------------------------------------------------
बीज तो मैंने उगा कर,खेत से अपने दिए थे,
फिर न जाने हो गयी क्यों,इस फसल में गड़बड़ी है
आ रहे है बालियों में,कुछ पके अनपके दाने ,
और कितनी बालियाँ है ,जो अभीखाली  पड़ी है
थी बड़ी उपजाऊ माटी,खाद भी मैंने दिया था
खेत को मैंने बड़े ही ,जतन से सिंचित किया था
हल चलाया था समय पर,करी थी अच्छी जुताई
और अच्छे बीज लेकर ,सही मुहुरत में बुवाई
उगे खा पतवार सारे ,छांट कर मैंने निकाले,
बहुत थे अरमान लेकिन ,गाज मुझ पर गिर पड़ी है
  हो गयी क्या गड़बड़ी है जो फसल सूखी पड़ी है
न तो ओले ही गिरे थे,और ना ही पड़ा पाला
सही मौसम ,सही बारिश ,सभी कुछ देखा संभाला
मगर पश्चिम की हवाएं ,कीट ऐसे साथ लायी
कर दिया बर्बाद ,फसलें,पनपने भी नहीं पायी
कर रहा हूँ जतन भरसक,लाऊ ऐसा कीटनाशक,
जो की फिर से लहलहा दे,फसल जो सूखी पड़ी है
  हो गयी क्या गड़बड़ी है जो फसल सूखी पड़ी है

 बहेती 'घोटू'

Saturday, May 21, 2011

इक्कीस तारीख

         इक्कीस तारीख
           ------------------
महीने में सबसे अच्छा दिन,
मुझको पहली तारीख लगती
क्योकि इस दिन  तनख्वाह मिलती
सबसे अच्छा महिना लगता मुझे फ़रवरी
क्योंकि इस महीने का हर दिन,
सबसे अधिक कीमती होता
काम करो अट्ठाईस दिन बस
और तुम पावो तनख्वाह पूरी
तीन पांच में झगडा होता,
नौ दो ग्यारह ,होते चम्पत
आँखें अगर चार हो जाती ,
सब कहते है हुई महोब्बत
और सबसे ज्यादा रोमांटिक,
तारीख होती, तारीख इक्कीस
क्योंकि इसमें छुपा हुआ होता है इक किस (kiss )

मदन मोहन बहेती 'घोटू'


हम तो बस सूखे उपले है

हम तो बस सूखे उपले है
जिनकी नियति जलना ही है
         रोज रोज क्यों जला रहे हो
दूध,दही,घी,थे  हम एक दिन,
              भरे हुए ममता ,पोषण से
पाल पोस कर बड़ा किया था,
               प्यार लुटाया सच्चे मन से
उंगली पकड़ सिखाया चलना,
                पढ़ा लिखा कर तुम्हे सवांरा
ये कोई उपकार नहीं था,
                 ये तो था कर्तव्य  हमारा
तुम चाहे मत करो,आज भी,
                  हमें तुम्हारी बहुत फिकर है
अब भी बहुत उर्वरक शक्ति,
                  हममे,मत समझो गोबर हैं
हमें खेत में डालोगे तो,
                  फसल तुम्हारी लहलहाएगी
जल कर भी हम उर्जा देंगे,
                  राख हमारी काम आएगी  
उसे खेत में बिखरा देना,
                 नहीं फसल में कीट  लगेंगे
जनक तुम्हारे हैं ,जल कर भी,
                   भला तुम्हारा ही सोचेंगे
क्योंकि हम माँ बाप तुम्हारे,
                  तुम्हे प्यार करते है जी भर
हाँ,हम तृण थे ,दूध पिलाया
                    तुम्हे,बच गए बन कर गोबर
और अब हम हैं सूखे उपले,
                    जिन्हें जला दोगे तुम एक दिन
राख और सब अवशेषों का,
                   कर दोगे गंगा में   तर्पण
       हम तो बस सूखे उपले है,   
     जिनकी नियति जलना ही है
               रोज रोज क्यों जला रहे हो
मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

हम तो बस सूखे उपले है

हम तो बस सूखे उपले है
जिनकी नियति जलना ही है
         रोज रोज क्यों जला रहे हो
दूध,दही,घी,थे  हम एक दिन,
              भरे हुए ममता ,पोषण से
पाल पोस कर बड़ा किया था,
               प्यार लुटाया सच्चे मन से
उंगली पकड़ सिखाया चलना,
                पढ़ा लिखा कर तुम्हे सवांरा
ये कोई उपकार नहीं था,
                 ये तो था कर्तव्य  हमारा
तुम चाहे मत करो,आज भी,
                  हमें तुम्हारी बहुत फिकर है
अब भी बहुत उर्वरक शक्ति,
                  हममे,मत समझो गोबर हैं
हमें खेत में डालोगे तो,
                  फसल तुम्हारी लहलहाएगी
जल कर भी हम उर्जा देंगे,
                  राख हमारी काम आएगी  
उसे खेत में बिखरा देना,
                 नहीं फसल में कीट  लगेंगे
जनक तुम्हारे हैं ,जल कर भी,
                   भला तुम्हारा ही सोचेंगे
क्योंकि हम माँ बाप तुम्हारे,
                  तुम्हे प्यार करते है जी भर
हाँ,हम तृण थे ,दूध पिलाया
                    तुम्हे,बच गए बन कर गोबर
और अब हम हैं सूखे उपले,
                    जिन्हें जला दोगे तुम एक दिन
राख और सब अवशेषों का,
                   कर दोगे गंगा में   तर्पण
       हम तो बस सूखे उपले है,   
     जिनकी नियति जलना ही है
               रोज रोज क्यों जला रहे हो
मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

Friday, May 20, 2011

गुस्सा

गुस्सा
====
पत्नी अपनी थी तनी,उसे मनाने यार
हमने उनसे कह दिया,गलती से एक बार
गलती से एक बार,लगे है हमको प्यारा
गुस्से में दूना निखरे है रूप तुम्हारा
कह तो दिया मगर अब घोटू कवी रोवे है
बात बात में वो जालिम गुस्सा होवे है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'
 

ब्लॉग हमारा-पोस्ट तुम्हारा

ब्लॉग हमारा-पोस्ट तुम्हारा
--------------------------------
मेरे दिल के इस ब्लॉग पर,
आता है जब पोस्ट तुम्हारा,
फूल हजारों खिल जाते है,
खुशियाँ छा जाती दोबारा
तुम अपने मन के भावों को ,
शब्दों के कपडे पहना कर
जब भी कभी प्रकाशित करती
मेरे मन में खुशियाँ भरती
याद तुम्हारी,बस आजाती
मेरे मन के वृन्दावन में,
रास रचाती
कल कल कर बहती सरिता सी याद तुम्हारी
आकर मिल जाती मेरे सागर से मन में
कुछ तो होगी कशिश हमारे खारेपन में
जो तुम्हारा मीठा सा जल
दोडा हुआ चला आता है मिलने,बेकल
खोने को अपना मीठापन
जब तुम करती पूर्ण समर्पण

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Thursday, May 19, 2011

दूर के पर्वत

दूर के पर्वत
--------------
दूर के पर्वत ,लगते है सुहावने
ये मुहावरा,सुना होगा आपने
मै भी यही मानता था अब तक
लेकिन तब तक,
मैंने नहीं घूमा था हिमांचल
नहीं गुजारे थे तेरे संग ,कुछ मीठे पल
पर लगता है अब
पास से और भी सुहावने  लगते है पर्वत

मदन मोहन बहेती 'घोटू;



 

मेरे घर, गमले की भिन्डी

मेरे घर गमले की भिन्डी
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मैंने अपने घर,गमले में
बोया बीज एक भिन्डी का
बड़े प्रेम से उसको सींचा
एक दिन देखा,
एक नन्ही कोंपल मुस्काई
मन में कितनी खुशियाँ छाई
धीरे धीरे एक नन्हा पौधा विकसा था
और एक दिन ,एक पीला सा फूल खिला था
एसा लगा की एक नन्ही सी कोई परी है
पीली पीली फ्रोक पहन कर नाच रही है
धीरे धीरे एक छोटी सी भिन्डी विकसी
हरे रंग की ,कोमल कोमल,और नाजुक सी
सुबह सुबह उठाते ही जाती,
उस गमले के नित्य पास मै
उत्सुकता से देखा करती,
रोज रोज उसका विकास मै
धीरे धीरे भिन्डी विकसी,लिए छरहरी सुन्दर काया
तब मेरे मन ने समझाया
इसे पकाले,वर्ना यदि ये पक जायेगी
कोई काम नहीं आएगी
इतने दिन का सब रोमांच,
रह गया बन कर सिर्फ याद था
हाँ, उस दिन सब्जी में आया बड़ा स्वाद था

मदन मोहन बहेती 'घोटू'


 

Wednesday, May 18, 2011

एक प्यासे कौवे की कथा-एक सूखी गगरी की व्यथा

ओ बेदर्दी!ओ बेदर्दी!
तुमने अपनी प्यास बुझाली,लेकिन मेरी मुश्किल कर दी
ओ बेदर्दी! ओ बेदर्दी!
कौन गाँव और कौन ठांव से,आये थे तुम प्यासे कागा
भोली भाली कांव कांव सुन ,प्यार मेरे मन में भी जागा
प्यासी आँख बिसुरती देखी,सूखे पांख फड़कते देखे
आकुल व्याकुल तन मन देखा ,नैना नीर तरसते देखे
मुझको देख अकेला छत पर,मन ही मन थे तुम मुस्काये
चमक आ गयी थी आँखों में,सच तुम थे कितने हर्षाये
आये झटपट,उड़ कर छत पर,बैठे ,इधर उधर कुछ ताका
सहमे ,धीरे धीरे बढ़ कर,मेरे मन अंतर में झाँका
देखा जीवन,मेरे उर में,सूनापन और भरी जवानी
मेरी तब नादान उमर थी,था छिछला छिछला ही पानी
तुम्हारा  अपना मतलब था ,तुम को थी निज प्यास बुझानी
लेकिन प्यार समझ मै बैठी,ये मेरी ही थी नादानी
मैंने सोचा,मै माटी की गुडिया,क्षण भर जीवन मेरा
अगर किसी के काम आ सकूं, होगा पूर्ण समर्पण मेरा
फिर तुम्हारी, प्यार भरी नज़रों ने था बेचैन कर दिया
तुम उड़ जाते,प्यार जताते,चुग चुग लाते थे कांकरिया
तुम्हारी ये प्रेम भेंट पा,मेरा मन भर भर जाता था
मै विव्हल सी ,हो जाती थी,प्रेम नीर ऊपर आता था
कुछ पागलपन ,एसा छाया,हम दोनों का,धीरज टूटा
और एक पल एसा आया,तुमने मेरा ,सब कुछ लूटा
 इतनी भाव विभोर हुई मै,मुझको कुछ भी होंश नहीं था
थोड़ी गलती ,मेरी भी थी,तुम्हारा सब दोष नहीं था
मै तो सपनों में खोई थी,आँख खुली जब सपना भागा
देखा तो तुम चले गए थे,अपनी प्यास बुझा कर कागा
 पल भर को तो चोंक गयी मै,विरह वेदना में थी खोयी
बेदर्दी थी,याद तुम्हारी ,मै कितने ही ,आंसू रोयी
पर तुमको आना ही कब था ,लोभी थे,रस के ,अवसर के
मैंने अपने उर में झाँका ,केवल कंकर ही कंकर थे
इसी झूठन बना गए तुम,नहीं किसीने भी अपनाया
हाय अभागन,रही बिलखती,बचा खुचा सब नीर सुखाया
सब जीवन रस ,सूख चुका अब,रस की जैसे याद रह गयी
तुमने तो नव जीवन पाया ,पर मै तो ,बर्बाद रह गयी
तुम तो बुद्धिमान कहाए ,मै मूरख रह गयी बिलखती
तुमने अपनी प्यास बुझाली ,लेकिन मेरी मुश्किल कर दी
  ओ बेदर्दी! ओ बेदर्दी!

मदन मोहन बहेती'घोटू'

Tuesday, May 17, 2011

मेरी जानू तेरे मन में क्या है,ये मै कैसे जानू?

मेरी जानू
तेरे मन में क्या है,ये मै कैसे जानू?
तेरी सुषमा
पैदा करती मुझमे ऊष्मा
तेरी खुशबू
कर देती मुझको बेकाबू
तेरा सपना
लगता मुझको बिलकुल अपना
और तेरे लब
मद के प्याले भरे लबालब
तेरी पलकें
जिनमे सपने पलते कल के
तेरी आँखें
चुभ चुभ जाती मन में आके
तेरा चेहरा
मन में प्यार जगाता गहरा
तेरे गाने
लगते दिल में  प्यार जगाने
तेरे ताने
लगते है सरगम की ताने
 छू तेरा तन
आता है मुझ में परिवर्तन
तुम कमाल हो
और हुस्न से भरा  माल हो
तेरा यौवन
कब मह्कायेगा मेरे जीवन का मधुवन

मदन मोहन बहेती 'घोटू'



 

मैंने पाया प्यार तुम्हारा-दिलसे है आभार तुम्हारा

मैंने पाया प्यार तुम्हारा-दिलसे है आभार तुम्हारा
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मेरी साँसों के स्वर अब बेचैन हुए है
तुझको पाने आकुल व्याकुल नैन हुए है
तुमने ली मनुहार मान और नज़र झुकाली
मुझको लगता है मैंने नव निधियां पाली
तुमने मेरा प्यार कबूला,ये मन झूला
एक तुम्ही मन में छाई ,सब सुध बुध भूला
हर पल, हर क्षण,दिल में तुम्हारी आहट है
मन में पहले मधुर मिलन की घबराहट है
बसे हुए है,नयनों में बस ,सपन तुम्हारे
गीत मिलन के उमड़ रहे है,मन में सारे
प्रियवर तुम कितनी सुन्दर हो,आकर्षक हो
तुम मनहर हो,मनभावन हो ,मनमोहक हो
चहक तुम्हारी,महक तुम्हारी,दहक तुम्हारी
 कितनी अच्छी,कितनी मादक,कितनी प्यारी
तुम में मधुवन की सुगंध है,तुम में यौवन
आसक्ति,आव्हान,आलिंगन,आल्हादन
तुमसे अपरम्पार प्यार है मेरे मन में
युगों युगों की प्यास  बुझा दी,युगल नयन ने
मै खुशकिस्मत हूँ,जो पाया प्यार तुम्हारा
मेरी प्रियतम ,है दिल से आभार तुम्हारा

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

आओ हम मंहगाई बढायें

आओ हम महंगाई बढ़ाये
जब तक सत्ता में है,जम कर लूट मचाएं
दूध,तेल,पेट्रोल,सब्जियां,आटा,दालें
धीरे धीरे करके इनके  दाम  बढाले
क्योंकि जीवन व्यापन को ये बहुत जरूरी
इन्हें खरीदना तो है जनता की मजबूरी
सस्ती हो या महंगी,लेना आवश्यक है
थोड़े दिन तक तो होती थोड़ी दिक्कत है
स्केमो,घोटालों में जो लूटा धन था
उसकी भी भरपायी करेगी  भोली जनता
जितना भी हो सकता,करलो,इसका दोहन
लड़ना भी है ,फिर से अगली बार इलेक्शन
उसके लिए जुटाना खर्चा आवश्यक है
हारेंगे या जीतेंगे,इस में भी शक है
आने वाले पांच साल का चना चबैना
इंतजाम इन सबका है हमको कर लेना
जनता का क्या ,जनता चिल्लाती रहती है
धीरे धीरे मारो तो सब कुछ सहती है
जब चुनाव आएगा कुछ रहत कर देंगे
कुछ दिन चूसो,लालीपॉप थमा कर देंगे
भले विरोधी दल कितने चींखे चिल्लायें
आओ हम मंहगाई बढायें

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Sunday, May 15, 2011

ब्रेक के बाद --आपका भविष्य

     ब्रेक के बाद --आपका भविष्य
      ----------------------------------
टी.वी. वाले भी गजब ढाते है
पहले तो ये ख़बरें दिखाते है
पेट्रोल के दाम पांच रूपये बढे
 ढूध के दाम  दो रूपये  चढ़े
रिज़र्व बैंक ने ब्याज की दरें बढाई
इस हफ्ते फिर बढ़ी महंगाई
इस बार महंगा आम होगा
बंद के कारण सड़कों पर जाम होगा
फलों को केमिकल से ,बढ़ाते ,पकाते है
मिठाइयों में सिंथेटिक खोवा मिलाते है
इस बार गरमी का ,रिकार्ड टूट जायेगा
बिजली में कटौती होगी,पानी कम आएगा
झपट्टेमार खींच लेते गले से चेन है
बेकाबू कानून व्यवस्था ,कर रही बेचैन है
और इसके बाद,हमें  ये सुनायेंगे
ब्रेक के बाद,
आपका आपका आज का दिन कैसा रहेगा,
पंडित जी बतलायेगे

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Saturday, May 14, 2011

ट्राफिक जाम

ट्राफिक जाम
--------------
सारे रस्ते जाम पड़े है,तेरे दिल तक आने के,
ट्राफिक सिग्नल फ़ैल हुए या हवालदार छुट्टी पर है
ह्रदय रोड पर इतना ट्राफिक ,मैंने देखा कभी नहीं,
कैसे तुझ तक पहुचूँगा मै,बहुत दूर तेरा घर है
ढूंढ रहा हूँ कोई शोर्ट कट,जिससे जल्दी आ पाऊ,
नयन द्वार तू खोले रखना,इन्तजार करना मेरा,
तू मेरे दिल में है,मै भी तेरे दिल में बस जाऊ,
जीवन की साड़ी आशाएं टिकी हुई अब तुझ पर है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Thursday, May 12, 2011

कलयुग

   कलयुग
-------------
आज कल के  गीत गाते ,बुरा बतला कर पुराना
कौन कहता है बदलता ,जा रहा है ये ज़माना
वही मिटटी ,वही कंकर,और वैसी ही धरा है
वही नीला नभ चमकता,और उदधि भी भरा है
है वही मौसम,हवाएं भी वही,दिन रात वो ही
है चमकता वो ही सूरज,और तारे ,चाँद वो ही
तो बदल फिर क्या गया है ,कोई तो हमको बताये
क्या पुराने जमाने में,था नहीं ,अब आ गया है
राम के युग में नहीं क्या,बाँध बांधे जा रहे थे
उन दिनों क्या नहीं पुष्पक ,व्योम में मंडरा रहे थे
और रावण जा रहा था ,स्वर्ग तक सीढ़ी लगाने
अमरिका और रूस जैसे ,लग गयें है ,चाँद जाने
उन दिनों भी कैद रावण ने वरुण को कर लिया था
जिस तरह हम पी रहे हैं ,नलों का पानी पिया था
उन दिनों हनुमान जैसे , उड्डयक थे,यान भी थे
सूर्य तक को ढक लिया,ऐसे किये अभियान भी थे
वारिधि पर शोध करना ,देव दानव ने किया था
मेरु सा जलपोत लेकर,समुन्दर को मथ दिया था
उन दिनों ब्रम्हास्त्र ,एटम बम से कुछ कम नहीं था
चल गया तो रोक ले ,कोई ,किसी में दम नहीं था
चिकित्सा विज्ञानं भी इतना समुन्नत कर लिया था
ह्रदय में रावण ने अपने, कुंड अमृत धर लिया था
उन दिनों अवतार शायद अविष्कारों को बताया
कृष्ण थे या क्रेन,गोवर्धन कभी जिसने  उठाया
और मच्छ  अवतार क्या था ,कुछ नहीं ,जलयान थे वो
बनी पनडुब्बी ,न कछुवा रूप  में भगवान थे वो
बराह का अवतार जिसने,धरा को बाहर निकाला
आज के बुलडोज़रों की तरह ही था यंत्र न्यारा
सेटेलाइट उन दिनों,अवतार वामन का कहाये
जो कि तीनो लोक को थे तीन पग में नाप आये
और हलधारी हुआ,अवतार था बलराम का जो
आजकल के ट्रेक्टरों कि तरह ही कुछ काम था जो
 उन दिनों भी रेडियो कि तरह थी आकाशवाणी
दिव्यदृष्टी ,टेलीविजन से कई वर्षो पुरानी 
उन दिनों भी पत्रकारों कि तरह नारद कई थे
और गोकुल के कन्हैया,डांस में कुछ कम नहीं थे
औरतों का राज तब भी था,अभी भी छा रहा है
बताओ ना,जमाने में, क्या बदलता जा रहा है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'


मजबूरी

       मजबूरी
       ----------
             १
पत्नी से कहने लगे, भोलू पति कर जोड़
आप हमीं को डाटती,हैं क्यों सबको छोड़
हैं क्यों सबको छोड़,पलट कर पत्नी बोली
मै क्या करूँ ,तेज  तीखी  है  मेरी   बोली
बड़े नाज़ और नखरे से मै पली हुई हूँ
नौकर चाकर वाले घर में बड़ी   हुई      हूँ
                  २
पत्नीजी कहने लगी,जाकर पति के पास
बतलाओ फिर निकालूँ,मन की कहाँ भड़ास
मन की कहाँ भड़ास,अगर डाटूं नौकर को
दो घंटे में छोड़ ,भाग जाएगा  घर को
सुनु एक की चार ,ननद से  जो कुछ बोलूँ
तुम्ही बताओ,बैठे ठाले  झगडा क्यों  लूं
                        ३
सास ,ससुर है सयाने,करते मुझसे प्यार
उनसे मै तीखा नहीं,कर सकती व्यवहार
कर सकती व्यवहार,मम्मी बच्चों की होकर
अपने नन्हे मासूमों को डाटूं क्यों कर
एक तुम्ही तो बचते हो जो सहते सबको
तुम्ही बताओ,तुम्हे छोड़ कर डाटूं  किसको?

मदन मोहन बहेती 'घोटू'


हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है

हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है
----------------------------------------------------
बीज तो मैंने उगा कर,खेत से अपने दिए थे,
फिर न जाने हो गयी क्यों,इस फसल में गड़बड़ी है
आ रहे है बालियों में,कुछ पके अनपके  दाने ,
और कितनी बालियाँ है ,जो अभी खली पड़ी है
 थी बड़ी उपजाऊ माटी,खाद भी मैंने दिया था
खेत को मैंने बड़े ही ,जतन से सिंचित किया था
हल चलाया था समय पर,करी थी अच्छी जुताई
और अच्छे बीज लेकर ,सही मुहुरत में बुवाई
उगे खा पतवार सारे ,छांट कर मैंने निकाले,
बहुत थे अरमान लेकिन ,गाज मुझ पर गिर पड़ी है
हो गयी क्या गड़बड़ी है ,जो फसल सूखी पड़ी है
न तो ओले ही गिरे थे,और ना ही पड़ा  पाला
सही मौसम ,सही बारिश ,सभी कुछ  देखा संभाला
मगर पश्चिम की  हवाएं ,कीट ऐसे साथ लायी
कर दिया बर्बाद ,फसलें,पनपने भी नहीं पायी
कर रहा हूँ जतन भरसक,लाऊ ऐसा कीटनाशक,
जो की फिर से लहलहा दे,फसल जो सूखी पड़ी है
हो गयी क्या गड़बड़ी है,फसल जो सूखी  पड़ी  है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Wednesday, May 11, 2011

मैके में बाकी सब कुछ था, साजन तेरा प्यार नहीं था

मैके में बाकी सब कुछ था,
                   साजन तेरा प्यार नहीं था
मेरे स्वप्न  सुनहरे तो थे,
                        पर पाया आकार नहीं था
मेरे प्यारे पापाजी थे,
                         स्नेहिल ,व्यस्त, मगर रोबीले
स्नेहिल ,व्यस्त ससुरजी भी हैं,
                            मगर सास के आगे ढीले
मम्मी थी ममता की मूरत,
                           मेरी शिक्षक और सखी थी
था कठोर अनुशासन उनका,
                            लेकिन दिल से मोम  रखी थी
ये कर ,वो कर,ऐसे मत कर,
                              जाने क्या क्या था समझाया
वर्ना तेरी सास कहेगी,
                                 तेरी माँ ने कुछ न सिखाया
बहुत प्यार करती सासू माँ,
                                  लेकिन थोडा सास पना है
सासू शक्कर,पर टक्कर की,
                                 यह मुहावरा, कहा सुना है
कभी डाट ती,ताने देती,
                                    किन्तु बाद में समझाती है
घर घर रहन सहन का अंतर,
                                     तौर तरीके बतलाती है
उनके प्यारे से बेटे पर ,
                                 मैंने कर अधिकार लिया है
यही गिला है उनके मन में,
                                  आखिर माँ तो होती माँ है
और ननद प्यारी बहना सी,
                                   है मासूम बड़ी चंचल सी
बहुत प्यार करती भाभी से,
                                   बातें सभी बताती दिल  की
मइके में सबको लगता था,
                                     बेटी नहीं , पराया धन है
पर अपना सा लगता ये घर,
                                        यहीं बिताना अब जीवन है
जब मै बड़ी हुई साजन के ,
                                      लगे जागने  सपने मन में
तुमसा जीवन साथी पाकर,
                                        खुशियाँ सभी मिली जीवन में
छेड़ा छाडी, मान मनोव्वल ,
                                            दिन रंगीन ,महकती राते
एक दूसरे में खो जाना,
                                   ख़तम न हो , वो मीठी  बातें
 मेरे जीवन  का ये उपवन,
                                       तब इतना गुलजार नहीं था
मइके में बाकि सब कुछ था,
                                        साजन तेरा प्यार  नहीं था

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

                                     
 

Tuesday, May 10, 2011

ससुराल संहिता

         ससुराल संहिता
        --------------------
                 १
कुछ साथी कोलेज के,मिले दिनों के बाद
निज पत्नी ,ससुराल पर,चली बात में बात
चली बात में बात,एक बोला मुस्काकर
यारों अपना तो दिल उलझा दिल्ली  जाकर
'घोटू' कहा दूसरे ने सर पर कर धरके
'अस्सी तो फस गए जाल  में 'जालंधर' के'
                    2
कहा तीसरे मित्र ने,बड़े गर्व के साथ
मिली 'मुरादाबाद' में,मन की मुझे मुराद
मन की मुझे मुराद,तभी चोथा मुस्काया
मै तो अपनी 'अली' 'अलीगढ' से हूँ लाया
'घोटू' कहा पांचवें ने भर आहें ठंडी
मेरे घर में आई 'चंडीगढ़' से 'चंडी'
                         3
छटवें के दिल की कली,कोलकत्ता की नार
बाँहों का घेराव जो,करती बारम्बार
करती बारम्बार,सातवें की थी बारी
बोला 'हाथ' हमारे आई ,'हाथरस' वाली
कह घोटू कविराय,आठवां हंस कर बोला
गिरा हमारे घर में,बम्बई का बम गोला


मदन मोहन बहेती 'घोटू'  
               

सवैया

         सवैया
       ----------
                 1
सीस पर सुहाय रहे ,केसन के दल पर दल,
         फेसन के मारे वा में तेल नहीं डारो है
मुखड़े पर पोत लियो ,मन भर के पाउडर,
         गरदन को रंग मगर ,दिखे कारो कारो है
फेशन की रोगिन ने ,जोगिन को रूप धरयो,
         पहन लियो भगवा सो कुर्तो ढीरो ढारो है
बल खाती बिजली से,बरस रही बदली से ,
             फेशन की पुतली से ,पड्यो हाय पालो है
                       २
सुरमा लगे लियो,अखियन अरु पलकन पर,
             सूरमा सी डोलत है, वर करे नैनन के
तनी रहे तन्वांगी, तुनक तुनक बात करे,
              ताने दे तान तान ,घात करे तन तन के
मुस्कावत ,मनभावत,चाहत पर शरमावत,
                  बनी ठनी रूपकनी,बात करे बन बन के
होटन हंसी फूट जाये,'घोटू' मन लूट जाए,
                  हाथन से छूट जाये, रूठ जाये मन मन के

मदन मोहन  बहेती 'घोटू'

               


Monday, May 9, 2011

तू ही तू है आँखों में

 तू ही तू है आँखों  में
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पहले सपने, फिर तेरी छवि,छाई यूं है आँखों में
दिल के हर कोने में बस तू ,तू ही तू है आँखों में
तुझसे पल भर की भी दूरी ,अब मुझको मंजूर नहीं,
चैन नहीं तुझको देखे बिन,एसा क्यूं है आँखों में
तुझे  देखता हूँ में जब जब ,निज सुध बुध खो देता हूँ
मंत्र मुग्ध सा मै हो जाता ,क्या जादू है आँखों में
है सुरमई ,कभी कजरारी ,मतवाली तेरी चितवन
मुझ पर डोरे डाल फसाती,मुझको तू है आँखों में
कभी दहकती अंगारों सी,कभी बरसती बिन बादल,
या फिर कोई जलजला आना,हुआ शुरू है आँखों में
सोयी थी या रोई थी,क्यों हुयी सुर्खरू ये  आँखें,
की रुखसार ,लबों की मेचिंग,तूने यूं है आँखों में
राहें तक तक,बैठा अब तक ,थक थक आँखें लाल हुई,
नहीं विरह के ,किन्तु जलन  से,अब आंसूं है,आँखों में
कोई कहता हिरणी सी है,कोई मछली,खंजन सी,
या तो कोई अजायबघर है,या फिर जू है आँखों में
नयन द्वार को,ढक कर,काले चश्मे से क्यों छुपा लिया
छुप छुप मुझको देख रही हो,या फिर फ्लू है  आँखों में

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

यादें --बचपन की

यादें --बचपन की
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मेरे बचपन की कुछ यादें,
स्मृतिपटल पर जब छाती है
मुझको कितना  तडफाती है
हम दो छोटे भाई बहन थे,
मम्मीजी थी ,पापाजी थे
बस छोटा सा परिवार था
सब के मन में भरा प्यार था
पापा कई बार बाहर से ,
आते थे ,रबड़ी लाते थे
थोड़ी थोड़ी सब खाते थे,
पर अतृप्त ही रह जाते थे
और अधिक रबड़ी खाने की ,
सदा लालसा रहती मन में
उस बचपन में
लेकिन एक बार पापाजी ,
बहुत अधिक रबड़ी ले आये
सबको देदी छूट प्रेम से,
जो भी चाहे ,उतना खाए
किन्तु अधिकता से रबड़ी की,
अरुचि सी थी मन में छाई
कई दिनों तक घर में फिर रबड़ी ना आई
मैंने इससे इतना सीखा,
किसी चीज की अधिकता,
अरुचिकर बना देती है
उसके स्वाद को
इसीलिए सहेज कर रखा है
बचपन की इस याद को
एक बार बस उत्सुकता से,
मैंने पूछ लिया पापा से
पापा ये क्या होती बियर
क्यों आकुल व्याकुल रहते है
लोग इसे पीने के खातिर
तो फिर एक दिवस पापाजी ,
बियर की एक बोतल लाये
थोड़ी खुद ली ,मम्मी को दी,
और एक एक घूँट ,हमको भी
 चखने को दिया
पर बियर की उस कडवी घूँट,
और तीखे तीखे स्वाद ने
मेरी उस उत्कंठा को,
 हमेशा   हमेशा के लिए दफ़न कर दिया
अगर मै उस दिन वो  कडवी घूँट ना पीती
तो मन में उत्कंठा ,हमेशा ही बनी रहती
जीवन का कितना बड़ा सच
सीखा था मेरे मन ने
उस बचपन में
और जब मेरी सहेलियां आती थी
और मुझे अपनी जन्म दिवस पार्टी में बुलाती थी
तो मेरा छोट भाई मेरे पीछे पड़ता था
की क्या पार्टी में,छोटा भाई भी आ सकता था
और पार्टी का शौक़ीन
 ,वो छोटा भाई ,बड़ा होने पर
काम में इतना व्यस्त हो जाता है
की पार्टियों में जाने से कतराता है
सच ,वक्त कैसे बदल जाता  है
बचपन के वो संस्कार
याद आतें है बार बार
पर परिस्तिथियाँ जीवन में,
कितना परिवर्तन लाती है
मेरे बचपन की कुछ यादें,
स्मृतिपटल पर जब छाती है
मुझको कितना तडफाती  है

श्वेता,  इलाहाबाद


             

सोचालय

 सोचालय
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 वह तो मेरा सोचालय है,जिसको शोचालय कहते तुम
मेरी कितनी ही सुन्दर रचनाओं का,ये   है       उदगम
 मेल निकल जाता है तन से ,भाव उभरते है मन में,
यह तो वो शंतिस्थल है ,जिसमे रहते तुम केवल तुम

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Sunday, May 8, 2011

मै हरिश्चंद्र हूँ

मै हरिश्चंद्र हूँ
मगर मै वो हरिश्चंद्र नहीं,
जो अपने वचनों की रक्षा के लिए
अपने बीबी बच्चों को बेच दे,
अपने आप को बेच दे
और सत्य पर अडिग रहे,
मै भी अपने वचनों की रक्षा करता हूँ
मगर उन वचनों की,
जो शादी के समय मैंने अपनी पत्नी को थे दिए,
और बीबी बच्चो का पेट पालने के लिए
मै जल्लाद के घर
भी हो सकता हूँ नौकर
बेचता मै भी हूँ अपने आप को
अपने इन्ही वचनों को निभाने को
परिवार की भूख मिटाने को
छोटा मोटा फेवर पाने को
सच से डिग जाता हूँ
झट से बिक जाता हूँ
रोज रोज बिकता हूँ
सत्य मै भी बोलता हूँ
जैसे मैंने अभी जो बात कही है
एक दम सत्य है,सही है
मै जो हूँ वही हूँ
मै हरिश्चंद्र हूँ,
पर वो हरिश्चंद्र नहीं हूँ

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

तुम डाल डाल -हम पात पात

तुम डाल डाल -हम पात पात
तुम भी नेता ,हम भी नेता
हम दोनों की है एक जात
हम एक गली में रहते है
पर एक दूजे से लड़ते है
नित भौं भौं करते रहते है
आपस में खूब झगड्तें है
पर जब खाना पीना हो तो
हम हो जाते है साथ साथ
तुम डाल डाल ,हम पात पात
जब तुम भी कम और हम भी कम
फिर आपस में कैसी अनबन
तुम भी भूखे ,हम भी भूखे
तो फिर क्यों करनी लाज शरम
बन जाए खिचड़ी क्यों ना हम,
आपस में करके मुलाक़ात
तुम दाल दाल ,हम भात ,भात
तुम बैठे हो पद पर अच्छे
हम तो है तुम्हारे चमचे
जब है सब ही फल फूल रहे
तो हम भी क्यों ना करें मजे
तुम भरे कडावों से बांटो
हम है फैलाये खड़े हाथ
तुम डाल देव,हम पात पात

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

एक अनार -सौ बीमार

एक अनार -सौ बीमार
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एक शुष्क दफ्तर में
काम करने
जब एक आधुनिका नार आ गयी
तर हो गया ,वातावरण दफ्तर का,
बहार  आ गयी
 उसके करीब आने की होड़
लोगों में इतनी बढ़ गयी
की दफ्तर की काया ही बदल गयी
साहब खुश थे,
काम की इफ़िसिएन्सि बढ़ गयी
देख कर के ये हाल
हमने कहा यार,
ये तो है वो ही मिसाल
एक अनार ,सो बीमार
हमारा ये कहना,
उनके एक बुजुर्ग से आशिक को
नहीं सुहाया
उन्होंने हमें समझाया
आप भी गजब ढाते है
एक सुमुखी 'नार' को 'अनार' बतलाते है
काहे एक 'अबला' को सताते है
 हमने कहा श्रीमान
हम एक 'नार'को 'अनार' कहें
तो आप बुरा मान जाते है
और खुद एक 'बला' को'अबला' बताते है
हमारी बात सुन,
पहले तो वो हमें ताकने लगे
और क्योंकि वो बगल में बैठी थी,
बगलें झाँकने  लगे

मदन मोहन बहेती 'घोटू'


मच्छर

मच्छर
---------
मच्छरों से त्रस्त एक महिला ने
पूछा अपनी पड़ोसन नवविवाहिता  पड़ोसिन से
आप मच्छरों को कैसे भगाती है?
कौन सी दवा काम में  लाती है?
नवविवाहिता बोली शरमा कर
जी ,हमें तंग नहीं करते  है मच्छर
दर असल हमारे बेडरूम का वातावरण इतना रोमांटिक है
कि मच्छर भी रोमांटिक हो जाते है
एक दूसरे में खो जाते है
हमको बिलकुल नहीं सताते है
पड़ोसिन बोली,
हाँ तभी वे सब के सब
थके हारे जब
हमारे यहाँ आते है
तो भिनभिनाते है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'



Saturday, May 7, 2011

मातृदिवस

मातृदिवस
-------------
 मातृदिवस को मत रहने दो,तुम केवल एक मात्र दिवस
 रोज करो सेवा माता की    ,रोज  मनाओ   मातृदिवस
माँ झरना आशिवादों का ,  माँ ममता का  सागर है
माँ सुरसरी स्नेह  की है, कोई न माँ से बढ़  कर है
माता का ही तो प्रसाद  है,ये तुम्हारा तन ,मन ,धन
जन्मदायिनी ,पालक, पोषक,सब माता है करो नमन
माँ का ऋण न चुका पाओगे,कितनी ही सेवा करलो
खुश किस्मत हो ,माँ है, आशीर्वादों  से झोली  भरलो
रोज करो सेवा माता  की ,रोज मनाओ मातृदिवस
मातृदिवस को मत रहने दो,तुम केवल एक मात्र दिवस

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

 

कारण -गरमी का

कारण -गरमी  का
---------------------
चार छुट्टियाँ मिलाती,मर्दों को महीने में
औरतें अधिकतर ही ,छुट्टियाँ मनाती है
तारे भी कई बार ,तड़ी मार देतें है,
अमावास को चंदा की भी छुट्टी  आती है
चार माह बरसते है ,बरस भर में बदल कुल,
और हवा अक्सर ही ,छुट्टी कर जाती  है
काम बिना छुट्टी कर,सूरज जब मन ही मन,
जलता है ,तो किरणों में ,फिर गरमी आती है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Thursday, May 5, 2011

उपदेश

    उपदेश
-------------
पत्नीजी थी डाटती,पतिजी थे भयभीत
अस्थि चर्म मम देह मह,तामे इसी प्रीत
तामे इसी प्रीत ,काम में हो जो इतनी
तो फिर कम हो जाए ,मुसीबत मेरी कितनी
साडी तक भी नहीं समेटना तुमको आती
रोज बनाते ,बेल न पाते ,गोल चपाती

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

प्रेम रस

प्रेम रस
---------
भले कंटीली तीखी अंखिया
भले रसीली मीठी बतियाँ
गोरा आनन  चाँद सरीखा
सुन्दर नाक नक्श सब तीखा
भले अंग अंग हो मदमाया
बदन छरहरा ,कंचन काया
नाज़ुक,कमसिन,यौवन पूरा
पर सारा सौन्दर्य अधूरा
भरे न पिया ,प्रेमरस गागर
तब तक न हो रूप उजागर

मदन मोहन बहेती घोटू'

चाह

    चाह
--------
प्रियतम!
मै नहीं चाहती,
चाय की पत्ती की तरह,
तुम संग ,घुलूं,मिलूँ,
और तुम मेरा सारा रस लेकर
मुझे ,शेष स्वादहीन पत्तियों की तरह
फ़ेंक दो
मै तो,
इंस्टंट कोफी की तरह
तुम में घुल मिल कर,
एक रस हो कर जीना चाहती हूँ
इसीलिए ,चाय नहीं ,
कोफी पीना  चाहती हूँ

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

सौन्दर्यानुभूति

 सौन्दर्यानुभूति
-------------------
मुझे ,
सूरज से ज्यादा,
मोहित करते हैं,
सूरज को ढकने वाले बादल
जिन में से छन छन कर,
आलोकित होती है,
सूरज की स्वर्णिम आभाHide all
और उससे भी ज्यादा,
आल्हादित करती है
सुन्दर ,सुडोल ,शोढ्सी के,
सुगठित तन पर
अल्पदर्शी वस्त्रों से झांकती हुई  कंचुकी
और कंचुकी की कगारों को तोडती हुई
यौवन की मधुरिम आभा

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

अर्थ का अनर्थ

   अर्थ का अनर्थ
---------------------
मैंने जब उनसे पूछा ,जीने की राह बतादो,
वो गए सीडियों तक और ,जीने की रह बता दी
वो लगे बैठ कर सीने,कुछ कपडे नए ,पुराने,
जब मैंने उनको सीने से लगने की चाह  बता दी
मै बोला आग लगी है, तुम दिल की आग बुझा दो
,वो गए दौड़ ले आये,दो चार बाल्टी पानी
देकर सुराही वो बोले,जी चाहे उतना पी लो,
मैंने जब उनको अपनी ,पीने की चाह  बता दी

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

नायिका भेद

नायिका भेद
---------------
सुबह हुआ हो गयी काम में व्यस्त नायिका
नौकर,महरी, बीमारी से त्रस्त नायिका
बढती महंगाई ,खर्चे से   ग्रस्त नायिका
मन से ,तन से ,दोनों से ,अस्वस्थ नायिका
अच्छे दिन की आशा से ,आश्वस्त नायिका
शाम ढले तक हो जाती है पस्त   नायिका
मिला पति का प्यार हो गयी मस्त नायिका
रोज इसी ढर्रे की है अभ्यस्त  नायिका

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Wednesday, May 4, 2011

मेरा पहला पहला प्यार

मेरा पहला पहला प्यार
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मेरे दिल के एक कोने में,नाम तुम्हारा बसा हुआ है

उम्र बालपन की थी मेरी,प्यार ,इश्क कुछ ज्ञान नहीं था
नारी और पुरुष के अंतर ,का भी ज्यादा भान  नहीं था
पहली बार देख लड़की को,लगा की क्या होती है लड़की
मिलने और बातें करने की ,थी मन में जिज्ञासा भड़की
तुम्हे देख कर मेरे दिल में,कुछ कुछ पहली बार हुआ था
तुम्हारी भोली नज़रों ने,मेरा नाजुक ह्रदय छुआ था
तुमसे दो बातें करने को,मेरा मन मचला करता था
तुम्हारा हँसना,मुस्काना,इस दिल को पगला करता था
मेरे मन, मष्तिष्क,सभी में ,छवि तुम्हारी ही थी छाई
तुमसे मिलना ,बातें करना,होता था कितना सुखदायी
वो तुम्हारी चंचल आँखे,वो तुम्हारा प्यारा आनन्
एक गुदगुदी सी करता था ,कितना गदगद होता था मन
नयन तरसते थे दर्शन को ,मन में तुम बिन चैन नहीं था
वो बचपन का पागलपन था ,या फिर पहला प्यार वही था
फिर तुम चल दी अपने रस्ते,मै भी निकला अपने रस्ते
एक निरी भावुकता थी वो,भुला दिया बस हँसते हँसते
पर उर आँगन में अब भी पदचाप तुम्हारा छपा हुआ है
मेरे दिल के एक कोने में ,नाम तुम्हारा बसा हुआ है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 

सा पर बा भारी पड़ता है

सा पर बा भारी पड़ता है
----------------------------
 बाल सदा है सर के ऊपर,सूरज को ढक लेते बादल
बा याने बीबी भारी है,श याने हर एक शोहर पर
सूखे पर बारिश है भारी,शातिर पर भारी बम बारी
सा याने की ओसामा पर,बहुत पड़े ओबामा भारी

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Tuesday, May 3, 2011

सच ,तुम जैसी हो ,बड़ी अच्छी हो

जब मै सोया होता हूँ,
तो मुझे झझकोर कर,
यूँ तो तुम मुझे कई बार जगाती हो
शायद मेरे खर्राटों से तंग होकर,
या बच्चों को स्कूल छोड़ने जाने के लिए,
या चाय का प्याला ठंडा न हो जाये इसलिए,
लेकिन कभी कभी जब तुम मुझे,
प्यार से सहला कर,यूँ ही जगा देती हो
तो तुम्हारी ये मादक जगाहट,
सचमुच मुझे निहाल कर देती है
या कभी जब तुम सज धज कर,
मेरे सामने आती हो
और तुम्हारे बिना पूछे की तुम कैसी लग रही हो
मै तुम्हारी तारीफ़ कर देता हूँ
तो तुम्हारे चेहरे पर आई ,संतुष्टि की मुस्कान
सच मुच बड़ी लुभावनी होती है
या जब नौकर या कामवाली बाई के ना आने पर
जब तुम बहुत व्यस्त और पस्त हो जाती हो
तो तुम्हारे कामो में मेरे  थोड़े से हाथ बँटा देने पर
तुम्हारी आँखों में आया धन्यवाद् का भाव
मुझे कितना गदगद कर देता है
या फिर जब कभी भी तुम मिठाई बनाती हो,
और मेरे डाईबिटिक होने के बावजूद भी
मीठी मीठी मनुहार कर
पहले मुझे चखाती हो
सच जीवन में कितना मिठास भर जाता है
या फिर तुम्हारे बिना जिद किये ,
जब मै तुम्हारे लिए कोई साडी या गहना,
तुम्हे सरप्राईज गिफ्ट देने को ले आता हूँ
तो तुम्हारा मुझ से ख़ुशी से लिपट जाना
कितना रोमांचक होता है
कभी कभी जब मेरी कुछ बात
तुम्हारी समझ में नहीं आती
पर तुम मुस्कराकर समझ जाने का अभिनय करती हो
तब कितनी समझदार लगती हो
और जब मेरी शरारत के जबाब में
तुम भी शरारत पर उतर आती हो
तो जिंदगी में कितना आनंद आ जाता है
बस तुम इसी तरह
मेरी जिंदगी में
हंसी ख़ुशी और रस की बरसात करती रहना
क्योकि तुम मुझ से बे इन्तहां मोहब्बत करती हो
और दिल की सच्ची हो
सच ,तुम जैसी हो ,बड़ी अच्छी हो

मदन मोहन बहेती 'घोटू'





Monday, May 2, 2011

अवहेलना

 क्या आपने कभी,
अपनी एक  दो दिन की बड़ी
दाढ़ी पर हाथ फेरा है
खुरदरे ,कंटीले ,चुभने वाले बाल
जिन्हें बार बार काटने को जी चाहता है
और हम उन्हें काटते भी हैं
पर निर्लज्ज फिर बढ जाते है
और लगते है चुभने
ये ही बाल,जब काटे नहीं जाते
तो बढ़ जाते है रेशमी मुलायम होकर
जिन्हें बार बार सहलाने को जी चाहता है
आदमी का छोटापन ,
उसे बना देता है
एक दो दिन की बढ़ी दाढ़ी के जैसा
खुरदुरा ,कंटीला और चुभने वाला
और उसका बढ्प्पन,उसे बनाता है
रेशमी ,मुलायम बालों जैसा
सबके मन को लुभानेवाला.
तो क्यों न हम,
छोटे लोगों के टुच्चे पन की तरफ
ध्यान ही न दें
शायद हमारी यह अवहेलना ही
उन्हें रेशमी  ,मुलायम बनादे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

रावण हर युग में मरता है

रावण हर युग में मरता है
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कितना ही हो ज्ञानी ,ध्यानी,कितनी ही भाषा का ज्ञाता
किन्तु बुद्धि यदि विध्वंशक हो ,सारा ज्ञान धरा रह जाता
ट्विन टॉवर पर हो हमला या,सीताजी का हुआ अपहरण
ओसामा बिन लादेन या फिर ,हो दशमुख लंकापति रावण
किन्तु कर्म हो अगर अधर्मी,करनी का फल मिलता ही है
ओसामा बिन   हो या रावण,  दुष्ट हमेशा   मरता   ही  है
आतंकी ,आतंकवाद को,एक दिन झुकना ही पड़ता है
त्रेता युग हो या फिर कलयुग, रावण हर युग में मरता है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Sunday, May 1, 2011

सवेरे सवेरे

        सवेरे सवेरे
----------------------
रात के बासीपन की,
भीनी भीनी खुशबू
और सवेरे की ताजगी की
सोंधी सोंधी सुगंध,
उनींदी पलकें,
अनसंवारी अलकें
और अपनी सुघड़ता के प्रति,
अनजानी लापरवाही
आलस भरी अंगड़ाइयों में
उमड़ता हुआ आव्हान,
सुनो,
कहीं चाय का प्याला ,
ढलक न जाए

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

हनुमान जी के मंदिर में

हनुमान जी के मंदिर में
----------------------------
             १
एक कंवारी कन्या
श्रद्धा भरे दिल में
हर मंगलवार को जाती थी
हनुमान जी के मंदिर में
पूजन के बाद
चढ़ाती थी प्रशाद
माथे पर सिन्दूर का टीका लगा
मांगती थी आशीर्वाद
हे प्रभु!मेरी इच्छा पूरी करदो
अच्छा सा वर दो
आपके प्रशाद का ये जो टीका
मै लगाती हूँ अपने माथे पर
उसे थोडा ऊँचा करवा दो
मेरी मांग में भरवा दो
           2
हनुमान जी के एक परम भक्त
प्रभु ध्यान में अनुरक्त
रोज हनुमान मंदिर जाते थे
हनुमान चालीसा गाते थे
चाहते थे बस इतना
जैसे राम के साथ  हनुमान पूजे जातें है,
ये भी बॉस के साथ पूजे जाये उतना
प्रभु की कृपा से एक दिन हुई अंतर प्रेरणा
बॉस को अपने कन्धों पर बताओ
उनके काम के लिए ,दूसरों का ग्राम जलाओ
बॉस की बीबी के लिए,समंदर भी लाँघ जाओ
उनके भाई बंधू के लिए पहाड़ भी उठाओ
बस,बॉस की अनुकंपा होगी अक्षुण
और बॉस के साथ पूजे जाओगे तुम
                    ३
हाथ जोड़ विनती करे,श्री बजरंगीलाल
एन.आर.आइ.बनादो,हमको दीनदयाल
हमको दीनदयाल ,कृपा हो जाए तुम्हारी
मंदिर में लटका दूं झालर डालर वाली
वर्क परमिट दिलवा दो ,प्रभु ,दिलवादो वीसा
अमेरिका में फैला दूं,हनुमान चालीसा

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

आम

                       1
काट कर टुकड़े किये,कांटा चुभाया,खा लिया
फल के राजा आम को ,ऐसे नहीं खाते मियां
हाथ में ले गिल बिलाओ,पियो रस की घूंट टिया
आम का असली मज़ा है,चूसने में   गुट टिया
      
                  2
आम  फलों का राजा होता है
ये जो आम होता है
बड़ा ही ख़ास होता है
ऐसा फलों में ही क्यों होता है?
ऐसा इंसानों में क्यों नहीं होता?
वह दिन जाने कब आएगा?
जब आम आदमी भी खास बन जाएगा

  madan mohan baheti'ghotoo'