Tuesday, March 9, 2021

कोविड १९ का वेक्सीन लेने पर
   सुई के प्रति तीन चतुष्पदी

सुई छोटी है ,तीखी है ,अगर चुभती,दरद देती
मगर ये जिंदगी में आपको हरदम  मदद  देती
बटन टूटे को फिर से सी ,बनाती पहनने लायक ,
फटा कपड़ा रफू करती ,जो उदड़ा तो तुरुप देती  

जखम में जो फटी चमड़ी ,सुई से ही सिली जाती
कोई भी ऑपरेशन हो , काम में   सुई ही आती
ये चुभती है जो फूलों में ,बना देती है वरमाला ,
जब लगती बनके इंजेक्शन ,बिमारी दूर भग जाती

अगर काँटा चुभे पावों में ,सुई से निकलता है
जो बनके वेक्सीन लगती ,कोरोना इससे डरता है
पेन्ट हो शर्ट हो या कोट ,ब्लाउज हो या हो चोली ,
सुई से सिल के हर कपड़ा ,बना फैशन संवरता है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Sunday, March 7, 2021

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Wednesday, February 10, 2021

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Tuesday, February 2, 2021

बचना ऐ हसीनो -इन बूढ़ों से

साठ के पार होते है ,मगर स्मार्ट होते है
पेंशन इनको मिलती है ,बड़े ही ठाठ होते है
तुम इनकी सादगी और मीठी बातों में न आना
 संभल के रहना ये बुड्ढे ,बड़े खुर्राट होते है

बड़ी मासूमियत से आपके ये दिल को हर लेंगे
अगर देखोगी मुस्काकर,मोहब्बत तुमसे कर लेंगे
पकड़ ऊँगली पहुंची तक ,पहुंचने में ये माहिर है ,
जरा सी घास डालोगी ,ये पूरा खेत चर  लेंगे

बड़ी मंहंगी पुरानी चीज है 'एंटीक 'कहलाती
पुराने चावलों से खुशबुएँ आती है मनभाती
भले ही कितना भी बूढा अगर हो जाए बंदर पर,
गुलाटी मारने की आदतें उसकी नहीं जाती

नज़र कमजोर ,आदत छूटती ना ताका झांकी की
न हिम्मत जाम पीने की ,मगर तलाश साकी की
राम का नाम लेने की ,उमर में रासलीला का ,
मज़ा मिल जाय कैसे भी ,है हसरत उम्र बाकी की

न फल है ना ही पत्ते है ,ये लगते पेड़ सूखे है
बहुत खेले खिलाये है ,मगर ये अब भी भूखे है
कभी भी भूल कर इनसे ,दया से प्यार मत करना
मिला जब भी इन्हे मौका ,कभी भी ये न चूके है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
ऐसा क्यों ?

लड़की अगर हो सीधी ,तो गाय कहाती है ,
लड़का अगर हो सीधा ,तो गधा क्यों कहाता
पत्नी की बात माने ,तो इसमें हर्ज क्या है ,
गुलाम जोरू का पर क्यों पति कहा जाता
विज्ञापनों में देखा ,औरत के वास्ते तो ,
होते है क्रीम,लोशन और लिपस्टिक के सारे ,
मर्दों के लिए खुजली और दाद की दवा का
या बवासीर ,कब्जी का विज्ञापन क्यों आता

घोटू  

Sunday, January 31, 2021

कैसे जाता वक़्त गुजर है

मुझको खुद मालूम नहीं है ,कैसे जाता वक़्त गुजर है
सोना,जगना ,खाना,पीना ,क्या जीवन बस इतना भर है

कम्बल कभी रजाई चादर ,या फिर पंखा ,कूलर,ए सी
ठिठुरन ,सिहरन,तपन,बारिशें ,मौसम की गति बस है ऐसी
अलसाया तन ,मुरझाया मन ,बढ़ी उमर का हुआ असर है
मुझको खुद मालूम नहीं है ,कैसे जाता वक़्त गुजर है

सूरज उगता ,दिन भर तपता ,फिर ढल जाता अस्ताचल में
लेकिन वो बेबस होता जब ,बादल  ढक  लेते है पल में
कब ढक ले आ बादल कोई, पल पल लगता रहता डर है
मुझको खुद मालूम  नहीं है ,कैसे जाता वक़्त गुजर है

बीते दिन की यादों में मन, बस खोया ही रहता अक्सर
आते याद ख़यालों में वो,रख्खा जिनका ख्याल उमर भर  
नहीं मगर उनको अब रहता ,ख्याल हमारा ,रत्ती भर है
मुझको खुद मालूम नहीं है ,कैसे जाता वक़्त गुजर है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '