Wednesday, May 7, 2014

गरमी और चुनाव

                    गरमी और चुनाव

पत्नी बोली ,गरम हो रहा है ये मौसम
चलो घूमने ,थोड़े दिन तक हिलस्टेशन
खर्चा पर जब ट्रेवल एजेंट ने बतलाया
सुन कर ऐ.सी. में भी हमें पसीना  आया
हमने पत्नी को समझाया ,सुनिए मेडम
गर्मी से चुनाव की गरम हुआ है मौसम
नेताओं ने रैली कर के ,भीड़ बुला के
आपस में गाली गलोच कर के चिल्ला के
एक दूसरे की पगड़ी को बहुत उछाला 
बहुत गरम है वातावरण ,बना ये डाला
इसीलिये तुम इस प्रचार को थमने तो दो
और नतीजा  ,इसका ज़रा निकलने तो दो
गरमी खा,गाली दे बजा रहे जो  डंडे
सब के सब ऐसे ही पड़  जाएंगे ठन्डे
ये ठन्डे  तो ठंडा हो जाएगा  मौसम 
हिलस्टेशन जा क्यों व्यर्थ करें खर्चा हम

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

डिग्गीराजा का बेंड बाजा

      डिग्गीराजा  का बेंड बाजा
                      १
प्रेमी पार्टी प्रवक्ता ,प्रिया टी वी एंकोर
करने में बकवास सब,दोनों ही सिरमौर
दोनों ही सिरमौर,मिले और प्यार हो गया
अमृत चखने  को बुड्ढा तैयार हो गया
डिग्गी राजा फिर से बन कर दूल्हे राजा
अब न डुगडुगी ,बल्कि बजाएं,बेंड और बाजा
                       २
मिलकर मेडम राय से ,किया किसी ने तर्क
तुम दोनों की  उमर  में ,तो है काफी फर्क
तो है काफी फर्क, अमृता  जी मुस्काई
बोली  जब  है प्यार ,उम्र ना पड़े दिखाई
अच्छी इनकम है,धन है,बुड्ढे में दम है
और मैं रानी कहलाउंगी ,ये क्या कम है
                       ३
डिग्गी दांत निपोर कर ,हुए प्रेम अनुरक्त
लिया किसी ने पूछ ये ,तुम राहुल के भक्त
तुम राहुल के भक्त ,कर रहे ब्याह दुबारा
और तुम्हारा 'बॉस' अभी तक बैठा  कंवारा
डिग्गी बोले,रहा इसलिये मैं शादी कर
धर्म भक्त का,करे बॉस को वो 'इंस्पायर'

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, May 6, 2014

दिग्गी राजा की राय

           दिग्गी राजा की राय

लोकसभा के टिकिट का  ,किया बहुत ही ट्राय
लेकिन हाईकमान ने ,सुनी न उनकी राय
सुनी न उनकी राय ,फेर में राजयसभा के
ऐसे  उलझे ,गिरे 'राय ',गोदी   में   जाके
तोड़ फोड़ की राजनीति से बाज न आये
तोडा उसका घर ,उसके संग नयन मिलाये
घोटू

Sunday, May 4, 2014

बदलाव की हवा

           बदलाव  की हवा

दो जगह में अब भी कायम ,वो कि वो ही दूरियां,
                मील के पत्थर सभी अपनी जगह तैनात है
पहुँचने का ,मंजिलों तक,समय लेकिन  घट गया,
               इस तरह से बढ़ गया ,रफ़्तार का उन्माद है
एक ज़माना था कभी हम,धीमी धीमी चाल से,
              चलते थे,विश्राम करते ,बरगदों की छाँव में
उन दिनों पथ भी नहीं थे आज जैसे रेशमी,
            पथरीली सारी सड़क थी ,चुभते पत्थर पाँव में
कभी पथ पर आम मिलते,कभी जामुन ,करोंदे,
             कितना उनमे स्वाद मिलता  ,तोड़ कर खाते हुए
पहुँचने का मंजिलों तक, मज़ा ही कुछ और था,
              हौले हौले कटता रस्ता  ,हँसते और गाते हुए
अब तो बैठो गाड़ी में और फुर्र से मंजिल मिले ,
               आज कल के सफर में ,अब ना रही वो बात है
दो जगह में अब भी कायम,वो की वो ही दूरियां,
               मील के पत्थरसभी,अपनी जगह ,तैनात है                  
पाट चौड़ा और निर्मल नीर से पूरित नदी,
                मस्तियों से कलकलाती ,बहा करती थी कभी
उसका शोषण इस कदर से किया है इंसान ने,
                 एक गंदा नाला  बन कर ,रह गयी वो बस अभी 
लहलहाते वन कटे ,शीतल हवाएँ रुक गयी,
                 पंछियों का थमा कलरव ,वाहनो का शोर है
चंद गमलों में सिमट कर ,रह गयी है हरितिमा ,
                  उग रहे कांक्रीट के जंगल , यहाँ  सब ओर है
 जल प्रदूषित ,वायु प्रदूषित ,प्रदूषित इंसान भी ,
                 ,प्रगति पथ पर,इस कदर से ,बिगड़ते हालात है
दो जगह में अब भी कायम ,वो की वो ही दूरियां,
              मील के पत्थर सभी अपनी जगह तैनात है
आदमी ये सोचता है ,पा लिया मैंने बहुत ,
                  किन्तु खो क्या क्या दिया ,इसका नहीं अहसास है
इस तरह ,भौतिक हमारी ,हो गयी है ,जिंदगी ,
                   प्रकृति का  सौंदर्य निरखें,समय किसके पास है
प्रातः उगते सूर्य की वो लालिमा,सुन्दर छटा,
                     रात अम्बर में सितारों की सजावट,चांदनी,
देखने की ये नज़ारे ,नहीं  फुर्सत किसीको ,
                     इस  कदर से मशीनी  अब हो गया है आदमी
भाईचारे में दरारें  ,टूटने  रिश्ते लगे,
                       डालरों के मोल बिकती ,भावना दिन रात है
दो जगह में अब भी कायम,वो की वो ही दूरियां,
                    मील के पत्थर सभी ,अपनी जगह तैनात है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Thursday, May 1, 2014

हम भी तो है

        हम भी तो है

अगर बसाना है जो कोई निगाहों में ,
                              हम भी तो है
साथ चाहिए,यदि जीवन की राहों में,
                             हम भी तो है
अगर जगह खाली तुम्हारी चाहों में,
                            हम भी तो है
क्या रख्खा है,यूं ही ठंडी आहों में ,
                            हम भी तो है
तकिये को तुमक्यों भरती  हो बाहों में ,
                             हम भी तो है
पलक बिछा कर बैठे तेरी राहों में,
                             हम भी तो है
जो दर्दे दिल करती दूर ,दवाओं में ,
                             हम भी तो है
भरने रंगत ,मौसम और फिजाओं में ,
                             हम भी तो है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

हाल-बुढ़ापे का

        हाल-बुढ़ापे का

याद  है  वो  जवानी  के  वक़्त  थे
हम बड़े ही कड़क थे और सख्त थे
ताजगी थी  , भरा हममें  जोश था
बुलंदी पर थे , हमें कब  होश   था
रौब था और बड़ी तीखी धार थी
थी नहीं परवाह कुछ संसार की
जवां था तन,जेब में भी माल था
इस तरह से  बन्दा ये खुशहाल था
हुए बूढ़े अब हम ढीले पड़  गए
वृक्ष के सब पात पीले पड़  गए
ना रहा वो जोश ,ना सख्ती रही
अब तो केवल भजन और भक्ति रही
मारा  करते फाख्ता थे जब मियां   
गए वो दिन, बुढ़ापे  के  दरमियाँ
हो गया   ऐसा हमारा हाल  है
मन मचलता ,मगर तन कंगाल है

मदन मोहन बहती'घोटू'

मेरा नंबर कब आएगा

           मेरा नंबर कब आएगा

खुदा ने खुल्ले हाथों बख्शी तुझको हुस्न की दौलत ,
     बड़ा तक़दीर वाला ही, तुम्हारा  प्यार पायेगा
बड़ी लम्बी लगी लाइन तेरे आशिकों की है ,
      लगाए आस बैठा मै ,मेरा नंबर कब आएगा
घोटू