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Monday, August 16, 2021
Saturday, August 14, 2021
किस्मत
जिस दिन और जहां पर भी है होता जब भी जन्म हमारा
उसी समय तय हो जाता है, पूरा जीवन चक्र हमारा
उस पल की ही ,ग्रह स्थिति से, जन्मकुंडली अपनी बनती
चाल ग्रहों की ही जीवन के, पल पल का संचालन करती उसी समय अनुसार हमारा, भाग्य लिखा जाता है सारा जन्म स्थल भूगोल बनाता, कद काठी, रंग गोरा काला भाग्य लिखा रहता मुट्ठी में ,रेखाओं में अंकित होता
कब तक जीना, कैसे जीना, कब मरना, सब निश्चित होता
पूर्व जन्म के संचित कर्मों का जो भी है लेखा-जोखा इस जीवन में हमें भोगना ,पड़ता है फल उन कर्मों का केवल अच्छे कर्म हमारे ,भाग्य बदलने में सक्षम है इसीलिए सत्कर्म करो तुम ,जब तक बाकी तुम में दम है कामयाबी का ये ही नुस्खा,काम करो जी जान लगन से अपना भाग्य स्वयं लिख लोगे, यदि चाहोगे सच्चे मन से
मदन मोहन बाहेती घोटू
किस्मत वाला पति
आप प्यार करते हैं जिनसे, उनसे ही कुछ कहते हैं
बच्चों को मां-बाप इसलिये,कभी डांटते रहते हैं
ताकि चले वे सही राह पर, गलत राह पर ना भटके
प्यार भरी यह डाट निराली, होती है सबसे हटके
जिन्हें समझते हो तुम अपना, ओर जिनसे है प्यार तुम्हे कभी कभी फटकार लगाने, का उन पर अधिकार तुम्हें स्कूल में मास्टर जी डांटे, पाठ याद करवाने को
डांट बॉस की दफ्तर में है, ड्यूटी सही निभाने को
डांट नहीं यह तो जादू का डंडा, बोले सर चढ़कर
जीवन में अनुशासन लाता ,हमें बनाता है बेहतर
प्यार प्रदर्शित अपना करने का यह ढंग निराला है
जिसे डाटती पत्नी वह पति ,सचमुच किस्मत वाला है
मदन मोहन बाहेती घोटू
फेंकू
तुम भी फेंकू,मैं भी फेंकू
रूप तुम्हारा, प्यारा सुंदर और नयना हिरनी से चंचल
एक नज़र जिसपर भी फेंको,कर देती हो उसको घायल
एक मीठी मुस्कान फेंक दो , बड़ी आस से तुम को देखूं
तुम भी फेंकू, मैं भी फेंकू
ऊंची ऊंची फेंका करता, मैं तुम्हारे प्यार का मारा
कैसे भी मैं तुम्हें पटा लूं और जीत लूं दिल तुम्हारा
प्रणय निवेदन करूं ,तुम्हारे आगे अपने घुटने टेंकू
तुम भी फेंकू, मैं भी फेंकू
हम दिल की फेंकाफेंकी में,उलझे कुछ ना कर पाए पर
फेंकू नेता, ऊंचे ऊंचे ,वादे फेंक ,जमे कुर्सी पर
भाषण और आश्वासन फेंके ताकि वोट उन्हीं को दे दूं
तुम भी फेंकू, मैं भी फेंकू
हम सब बातों के फेंकू पर ,असली फेंकू निकला नीरज
भाला फेंक,स्वर्ण ले आया और लहराया भारत का ध्वज
स्वर्ण पदक टोक्यो में जीता ,बड़े गर्व से उसको देखूं
तुम भी फेंकू, मैं भी फेंकू
मदन मोहन बाहेती घोटू
Thursday, August 12, 2021
ऐसा साज मुझे दे दो तुम
जब भी दिल के तार छिड़े तो ,
निकले मधुर रागिनी मोहक ,
जो अंतर तक को छू जाए
ऐसा साज मुझे दे दो तुम
बीती खट्टी मीठी यादों,
के सब पन्ने बिखरे बिखरे
उन्हें समेट, सजा फिर से,
जिल्दसाज ऐसा दे दो तुम
भटक रहे बादल से मन को, घनीभूत कर जो बरसा दे सूखे अपनेपन की खेती ,को नवजीवन दे, सरसा दे शुष्क पड़ी जो मन की सरिता, बह निकले ,उसमें कल कल हो
है सुनसान पड़ी यह बस्ती, दिल की, इसमें कुछ हलचल हो
इस दुनिया में बहुत त्रसित हूं
परेशान हूं, रोग ग्रसित हूं,
मेरे मुरझाए चेहरे पर
खुशियां आज मुझे दे दो तुम
जो अंतरतर तो छू जाए ,
ऐसा साज मुझे दे दो तुम
एक जमाना था जब हम भी, फूलों से महका करते थे उड़ते थे उन्मुक्त गगन में, पंछी से चहका करते थे
सूरज जैसा प्रखर रूप था , धूप पहुंचती आंगन आंगन सावन सूखे, हरे न भादौ, मतवाला था हर एक मौसम फिर से फूल खिले बासंती
फिर आए जीवन में मस्ती
खुशी भरे जीवन जीने का,
वो अंदाज मुझे दे दो तुम
जो अंतरतर को छू जाए ,
ऐसा साज मुझे दे दो तुम
मदन मोहन बाहेती घोटू
मैंने जीना सीख लिया है
यह बीमारी वह बीमारी
रोज-रोज की मारामारी
यह मत खाओ, वह मत खाओ
मुंह पर अपने मास्क लगाओ
गोली ,कैप्सूल ,इंजेक्शन
खाओ दवाएं, फीका भोजन
हर एक चीज पर थी पाबंदी
पाचन शक्ति पड़ गई मंदी
मेरी हालत बुरी हो गई
चेहरे की मुस्कान खो गई
मुझे प्यार से समझा तुमने,
मेरे मन को ठीक किया है
मैंने जीना सीख लिया है
तुमने बोला ,सोच सुधारो
यू मत अपने मन को मारो
मनमाफिक, सब खाओ पियो
लेकिन घुट घुट कर मत जियो
तन अनुसार ,ढाल लो तुम मन
आवश्यक पर कुछ अनुशासन
मज़ा सभी चीजों का लो पर
रखो नियंत्रण तुम अपने पर
मौज मस्तियां खूब मनाओ
मित्रों के संग नाचो गाओ
नई फुर्ती और नए जोश ने ,
कर मुझ को निर्भीक दिया है
मैंने जीना सीख लिया है
जिस दिन से यह शिक्षा पाई
नव जीवन शैली अपनाई
बीमारी सारी गायब है
चेहरे पर आई रौनक है
फुर्तीला हो गया चुस्त हूं
लगता है मैं तंदुरुस्त हूं
मेरी सोच सकारात्मक है
और जीने की बढ़ी ललक है
बाकी जितनी बची उमर है
अब जीना सुख से ,हंसकर है
मेरे मन के वाद्य यंत्र ने ,
सीख गया संगीत लिया है
मैंने जीना सीख लिया है
मदन मोहन बाहेती घोटू
Tuesday, August 10, 2021
शब्दों का फंडा
उनके घर क्या कार आ गई अब उनका आकार बढ़ गया
जबसे उनके नयन लड़े हैं ,आपस में है प्यार बढ़ गया
पहन शेरवानी इठला वो ,खुद को शेर समझ बैठे हैं
घर में कुर्सी मेज नहीं है, मेजबान पर बन बैठे हैं
विष का वास मुंह में जिनके हम उनका विश्वास न करते
सदा चार की बात करें जो ,सदाचार व्यवहार न करते
असरदार वह नहीं जरा भी, फिर भी है सरकार कहाते
हारे ना,वो जीत गए हैं ,फिर भी हार गले लटकाते
है मकान तो उनका पक्का, किंतु कान के वह है कच्चे
चमचे से खाते ,खिलवाते,पर खुद कहलाते हैं चमचे
जब से उनके भाव बढ़े हैं ,हमको भाव नहीं देते हैं
उड़ना जब से सीख गए हैं, सबके होश उड़ा देते हैं
होता मन में मैल अगर तो मेल नहीं मिलता है मन का
टांके भिड़े सिले ना फिरभी चालू हुआ सिलसिला उनका
कुछ भी उनमें नहीं नया रे ,पर है उनके बारे न्यारे
भारी सर तो चल सकता है,भारी पैर न चले जरा रे
नाम लौंग पर बड़ी शार्ट है ,तेज हीन पर तेज पान है
न तो दाल है ना चीनी है ,दालचीनी का मगर नाम है कहते हैं पूरी उसको पर ,आधी भी है खाई जाती
और गुलाबजामुन में खुशबू ना गुलाब,जामुन की आती ना अजवाइन में वाइन है नाशपति में नहीं पति है
और पपीता बिना पिता के,हर एक शब्द की यही गति है
कहते जिसको गरममसाला,वो बिलकुल ठंडा होता है
शब्द गुणों के डबल रोल का ,ऐसा ही फंडा होता है
मदन मोहन बाहेती घोटू
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