Tuesday, May 31, 2011

'मै'

जब मानव है कुछ पा जाता
और यदि उसमे 'मै' आ जाता
वह इतराता
'मै ' का गरूर
  मय
के सरूर से ,
कई गुना होता है मादक
' मै' आने पर ,
लायक से लायक भी बन जाते नालायक
'मै',मय,माया,
बहुत नशीले ये होते है
माया का मय पी लेने पर
मन में बस मै ही मै छाता
'मै' तो है अपनों का बैरी ,उन्हें भुलाता
इतना आत्मकेन्द्रित हो जाता है मानव,
सिमटा रहता एक कक्ष में
जिस में लगे हुए होते हर तरफ आईने
और नज़र आता है अक्स स्वयं का केवल,
सभी तरफ होता मै ही मै
वृक्षों में जब फल लगते है,
कहता वृक्ष लगाये मैंने
मगर जड़ों को वह बिसराता
बोकर बीज ,सींच कर किसने बड़ा किया है ,
याद न आता
'मै' हूँ,हम है
बड़ा अहम् है
मै और मेरा कुछ ना रहता,सिर्फ बहम है
क्योंकि साथ नहीं कुछ जाता
मेरी मानो
मै को पास पटखने मत दो
क्योकि तुम में,अगर नहीं मै
प्रेम भाव है और समर्पण
तभी सफल होता है जीवन
हे मेरे प्रभु!
मेरे सब 'मै' को हर ले तू
मेरे मन में बसा रहे बस एक तू हो तू

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

'

No comments:

Post a Comment