Wednesday, December 14, 2011

बदनसीबी

        बदनसीबी
       --------------
मुफलिसी की मार कुछ ऐसी पड़ी,
               भूख से बदहाल था सारा बदन
सोचा जाए,धूप खायें,बैठ कर,
               कुछ तो खाया,सोच कर बहलेगा मन
बेमुरव्वत सूर्य भी उस रोज तो,
               देख कर आँखें चुराने लग गया
छुप गया वो बादलों की ओट में,
                बेरुखी ऐसी  दिखाने लग गया   
फिर ये सोचा,हवायें ही खाए हम,
                गरम ना तो चलो ठंडी ही सही
देख हमको वृक्ष ,पत्ते,थम गए,
                 आस खाने की हवा भी ना रही
बहुत ढूँढा,कुछ न खाने को मिला,
                 यही था तकदीर में ,गम खा लिया
प्यास से था हलक सूखा पड़ा ,
                 आसुओं को पिया,मन बहला लिया

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

No comments:

Post a Comment

Post a Comment