Monday, May 9, 2011

यादें --बचपन की

यादें --बचपन की
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मेरे बचपन की कुछ यादें,
स्मृतिपटल पर जब छाती है
मुझको कितना  तडफाती है
हम दो छोटे भाई बहन थे,
मम्मीजी थी ,पापाजी थे
बस छोटा सा परिवार था
सब के मन में भरा प्यार था
पापा कई बार बाहर से ,
आते थे ,रबड़ी लाते थे
थोड़ी थोड़ी सब खाते थे,
पर अतृप्त ही रह जाते थे
और अधिक रबड़ी खाने की ,
सदा लालसा रहती मन में
उस बचपन में
लेकिन एक बार पापाजी ,
बहुत अधिक रबड़ी ले आये
सबको देदी छूट प्रेम से,
जो भी चाहे ,उतना खाए
किन्तु अधिकता से रबड़ी की,
अरुचि सी थी मन में छाई
कई दिनों तक घर में फिर रबड़ी ना आई
मैंने इससे इतना सीखा,
किसी चीज की अधिकता,
अरुचिकर बना देती है
उसके स्वाद को
इसीलिए सहेज कर रखा है
बचपन की इस याद को
एक बार बस उत्सुकता से,
मैंने पूछ लिया पापा से
पापा ये क्या होती बियर
क्यों आकुल व्याकुल रहते है
लोग इसे पीने के खातिर
तो फिर एक दिवस पापाजी ,
बियर की एक बोतल लाये
थोड़ी खुद ली ,मम्मी को दी,
और एक एक घूँट ,हमको भी
 चखने को दिया
पर बियर की उस कडवी घूँट,
और तीखे तीखे स्वाद ने
मेरी उस उत्कंठा को,
 हमेशा   हमेशा के लिए दफ़न कर दिया
अगर मै उस दिन वो  कडवी घूँट ना पीती
तो मन में उत्कंठा ,हमेशा ही बनी रहती
जीवन का कितना बड़ा सच
सीखा था मेरे मन ने
उस बचपन में
और जब मेरी सहेलियां आती थी
और मुझे अपनी जन्म दिवस पार्टी में बुलाती थी
तो मेरा छोट भाई मेरे पीछे पड़ता था
की क्या पार्टी में,छोटा भाई भी आ सकता था
और पार्टी का शौक़ीन
 ,वो छोटा भाई ,बड़ा होने पर
काम में इतना व्यस्त हो जाता है
की पार्टियों में जाने से कतराता है
सच ,वक्त कैसे बदल जाता  है
बचपन के वो संस्कार
याद आतें है बार बार
पर परिस्तिथियाँ जीवन में,
कितना परिवर्तन लाती है
मेरे बचपन की कुछ यादें,
स्मृतिपटल पर जब छाती है
मुझको कितना तडफाती  है

श्वेता,  इलाहाबाद


             

सोचालय

 सोचालय
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 वह तो मेरा सोचालय है,जिसको शोचालय कहते तुम
मेरी कितनी ही सुन्दर रचनाओं का,ये   है       उदगम
 मेल निकल जाता है तन से ,भाव उभरते है मन में,
यह तो वो शंतिस्थल है ,जिसमे रहते तुम केवल तुम

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Sunday, May 8, 2011

मै हरिश्चंद्र हूँ

मै हरिश्चंद्र हूँ
मगर मै वो हरिश्चंद्र नहीं,
जो अपने वचनों की रक्षा के लिए
अपने बीबी बच्चों को बेच दे,
अपने आप को बेच दे
और सत्य पर अडिग रहे,
मै भी अपने वचनों की रक्षा करता हूँ
मगर उन वचनों की,
जो शादी के समय मैंने अपनी पत्नी को थे दिए,
और बीबी बच्चो का पेट पालने के लिए
मै जल्लाद के घर
भी हो सकता हूँ नौकर
बेचता मै भी हूँ अपने आप को
अपने इन्ही वचनों को निभाने को
परिवार की भूख मिटाने को
छोटा मोटा फेवर पाने को
सच से डिग जाता हूँ
झट से बिक जाता हूँ
रोज रोज बिकता हूँ
सत्य मै भी बोलता हूँ
जैसे मैंने अभी जो बात कही है
एक दम सत्य है,सही है
मै जो हूँ वही हूँ
मै हरिश्चंद्र हूँ,
पर वो हरिश्चंद्र नहीं हूँ

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

तुम डाल डाल -हम पात पात

तुम डाल डाल -हम पात पात
तुम भी नेता ,हम भी नेता
हम दोनों की है एक जात
हम एक गली में रहते है
पर एक दूजे से लड़ते है
नित भौं भौं करते रहते है
आपस में खूब झगड्तें है
पर जब खाना पीना हो तो
हम हो जाते है साथ साथ
तुम डाल डाल ,हम पात पात
जब तुम भी कम और हम भी कम
फिर आपस में कैसी अनबन
तुम भी भूखे ,हम भी भूखे
तो फिर क्यों करनी लाज शरम
बन जाए खिचड़ी क्यों ना हम,
आपस में करके मुलाक़ात
तुम दाल दाल ,हम भात ,भात
तुम बैठे हो पद पर अच्छे
हम तो है तुम्हारे चमचे
जब है सब ही फल फूल रहे
तो हम भी क्यों ना करें मजे
तुम भरे कडावों से बांटो
हम है फैलाये खड़े हाथ
तुम डाल देव,हम पात पात

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

एक अनार -सौ बीमार

एक अनार -सौ बीमार
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एक शुष्क दफ्तर में
काम करने
जब एक आधुनिका नार आ गयी
तर हो गया ,वातावरण दफ्तर का,
बहार  आ गयी
 उसके करीब आने की होड़
लोगों में इतनी बढ़ गयी
की दफ्तर की काया ही बदल गयी
साहब खुश थे,
काम की इफ़िसिएन्सि बढ़ गयी
देख कर के ये हाल
हमने कहा यार,
ये तो है वो ही मिसाल
एक अनार ,सो बीमार
हमारा ये कहना,
उनके एक बुजुर्ग से आशिक को
नहीं सुहाया
उन्होंने हमें समझाया
आप भी गजब ढाते है
एक सुमुखी 'नार' को 'अनार' बतलाते है
काहे एक 'अबला' को सताते है
 हमने कहा श्रीमान
हम एक 'नार'को 'अनार' कहें
तो आप बुरा मान जाते है
और खुद एक 'बला' को'अबला' बताते है
हमारी बात सुन,
पहले तो वो हमें ताकने लगे
और क्योंकि वो बगल में बैठी थी,
बगलें झाँकने  लगे

मदन मोहन बहेती 'घोटू'


मच्छर

मच्छर
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मच्छरों से त्रस्त एक महिला ने
पूछा अपनी पड़ोसन नवविवाहिता  पड़ोसिन से
आप मच्छरों को कैसे भगाती है?
कौन सी दवा काम में  लाती है?
नवविवाहिता बोली शरमा कर
जी ,हमें तंग नहीं करते  है मच्छर
दर असल हमारे बेडरूम का वातावरण इतना रोमांटिक है
कि मच्छर भी रोमांटिक हो जाते है
एक दूसरे में खो जाते है
हमको बिलकुल नहीं सताते है
पड़ोसिन बोली,
हाँ तभी वे सब के सब
थके हारे जब
हमारे यहाँ आते है
तो भिनभिनाते है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'



Saturday, May 7, 2011

मातृदिवस

मातृदिवस
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 मातृदिवस को मत रहने दो,तुम केवल एक मात्र दिवस
 रोज करो सेवा माता की    ,रोज  मनाओ   मातृदिवस
माँ झरना आशिवादों का ,  माँ ममता का  सागर है
माँ सुरसरी स्नेह  की है, कोई न माँ से बढ़  कर है
माता का ही तो प्रसाद  है,ये तुम्हारा तन ,मन ,धन
जन्मदायिनी ,पालक, पोषक,सब माता है करो नमन
माँ का ऋण न चुका पाओगे,कितनी ही सेवा करलो
खुश किस्मत हो ,माँ है, आशीर्वादों  से झोली  भरलो
रोज करो सेवा माता  की ,रोज मनाओ मातृदिवस
मातृदिवस को मत रहने दो,तुम केवल एक मात्र दिवस

मदन मोहन बहेती 'घोटू'