Thursday, March 21, 2013

      उम्र बुढापे की कमाल है

 बचपन में मन  होता निश्छल
हंसता एक पल,रोता एक पल
जब अबोध बालक मुस्काता
उस पर प्यार सभी को आता
फिर  किशोर वय  में भी  अक्सर 
बोझ पढाई का  है मन पर
और जवानी है जब आती
जीवन में खुशिया छा जाती
कैसे खायें  और   कमायें
मन में रहती है चिंतायें
ऐसे ही कट जाता यौवन
बहुत तरंगित तन,चिंतित मन
करते हम प्रयास है जी भर
बस जाए संतानों के घर
हमें बुढ़ापा आते आते
सबके अपने  घर बस जाते
घर में छा जाता सूनापन
खाली खाली लगता जीवन
तन पड़ने लगता है ढीला
हो जाता मन बहुत रंगीला
उम्र बुढ़ापे की जब आती
असली तभी  जवानी छाती
मन चाहे करना धमाल है
उम्र बुढ़ापे की भी कमाल है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'






काहे बखेड़ा करते है

     काहे बखेड़ा करते है 

मोह माया के चक्कर में हम,मन को मैला करते है
खुश भी होते,परेशान भी,मुश्किल झेला करते है
ऊपर चढ़ते है इठला कर,झटके से नीचे गिरते ,
खेल सांप का  और सीडी का ,हरदम खेला करते है
कोई जरा बुराई करदे ,तो उतरा करता चेहरा ,
कोई जब   तारीफ़ कर देता,खुश हो फैला करते है
सब से आगे बढ़ने की है जिद हममे  इतनी रहती,
सभी परायों और अपनों को,पीछे ठेला करते है
बिना सही रस्ता पहचाने ,पतन गर्द में गिर जाते,
बिना अर्थ जीवन का जाने,व्यर्थ झमेला करते है
खाली हाथों आये थे और खाली हाथों जायेंगे,
कुछ भी साथ नहीं जाता पर तेरा मेरा करते है
'घोटू'जितना भी जीवन है,हंसी ख़ुशी जी भर जी लें ,
उठक पटक में उलझा खुद को,काहे  बखेड़ा  करते है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

अविरल जीवन

        अविरल जीवन

जल से बादल,बादल से जल
मेरा जीवन चलता अविरल
सुख आते है,मन भाते है
संकट आते,टल जाते है 
कभी गरजना भी पड़ता है
कभी कड़कना भी पड़ता  है
कभी हवा में उड़ता चंचल
जल से बादल ,बादल से जल
कभी रुई सा उजला,छिछला
विचरण  करता हूँ मै  पगला
कभी प्रसव पीड़ा में काला
होता जल बरसाने वाला
घुमड़ घुमड़ छाता धरती पर
जल से बादल,बादल से जल
उष्मा से निज रूप बदलता
तप्त धरा को शीतल करता
उसे हरी चूनर पहराता
विकसा बीज,खेत लहराता
बहती नदिया,भरे सरोवर
जल से बादल,बादल से जल

मदन मोहन बाहेती'घोटू;

Wednesday, March 20, 2013

जीवन तो है चाट चटपटी

      जीवन तो है चाट चटपटी  

जीवन तो है तला पकोड़ा ,मस्त चटपटा ,गरम गरम ,
                       कोई चेप चेप चटनी से,इसके मज़े  उठाता है
है परहेज किसी को मिर्ची से या तली वस्तुओं से ,
                        'क्लोस्ट्राल 'नहीं बढ़ जाए ,खाने में घबराता है
आलू की टिक्की सा यौवन,गरम गरम ,सौंधी खुशबू,
                         जैसे लगता चाट चटपटी,मुंह में आता है पानी
कोई 'टोन्सिल 'से डरता है तो कोई 'इन्फेक्शन 'से,
                           मन ललचाता फिर भी खाने में करता आना कानी
एक गोलगप्पे से जैसा ,जब हो खाली ये जीवन,
                          इसमें भरो चटपटा पानी ,मुंह में  रख्खो ,खा जाओ
 तीन समोसे के कोनो में ,तीन लोक दर्शन कर लो ,
                            जी भर इनका मज़ा उठाओ, निज मन को मत तरसाओ 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

माँ की मेहरबानियाँ

      माँ की मेहरबानियाँ

दूध ,दही,खोया पनीर या 'चीज 'नाम  कुछ भी दे दो,
               लेकिन अपने मूल रूप में,सिर्फ घास  का था तिनका
गौ माता ने मुझको अपना प्यार दिया और अपनाया ,
                निज स्तन की धारा से ,निर्माण किया है इस तन का
मुझ से ज्यादा ,क्या जानेगा ,कोई महिमा माता की ,
                 मै क्या था,माँ की ममता ने,क्या से क्या है बना दिया
दिये  पौष्टिक  गुण इतने ,भरकर मिठास का मधुर स्वाद ,
                   मै तो था एक जर्रा केवल,मुझे आसमां   बना दिया

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

Sunday, March 17, 2013

सपने सपने -कब है अपने

सपने सपने -कब है अपने

सपने सपने
कब है अपने
ये अपने ही जाये  होते 
खुलती आँख,पराये होते
बचपन में ,राजा ,रानी के
किस्सों से ,दादी,नानी के
और वैभव के ,किशोर मन में
खो जाते ,जीवन उलझन में
कुछ सच होते,कुछ तडफाते
सपने तो है ,आते जाते
आये ,बिना बुलाये होते
खुलती आँख,पराये होते
जब यौवन की ऋतू मुस्काती
फूल विकसते,कोकिल  गाती 
कोई मन में बस जाता है
तो वो सपनो में आता   है
फिर शादी और जिम्मेदारी
रोज रोज की मारामारी
हरदम मुश्किल,ढाये होते
खुलती आँख ,पराये होते
फिर जब होती है संताने 
सपने फिर लगते है आने
बच्चे जो लिख पढ़ जायेंगे
काम बुढापे में आयेंगे  
बेटा बेटी ,अपने जाये
शादी होते,हुये पराये
बस यादों के साये  होते 
खुलती आँख,पराये होते  

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कोई डॉक्टर बताये - मुझे क्या हुआ है?

     कोई डॉक्टर  बताये - मुझे क्या हुआ है?

घनीभूत कुछ तरल ,नासिका  छिद्रों में है जमा हुआ
हुआ मार्ग अवरुद्ध ,श्वास का गमन,आगम थमा हुआ
कंठ मार्ग भी वाधित है ,कुछ भी गटको तो करे पीर
शिथिल हुआ तन,आलस छाया ,है परेशान ,ये मन अधीर
जलन चक्षुओं में होती है,मस्तक थोडा भारी है
उष्मित है तन,सुनो चिकित्सक,मुझको कौन बिमारी है
है उपचार कौनसा इस ,व्याधि का मुझको बतलाओ 
शीध्र स्वस्थ हो  जाऊं मै भेषज कुछ ऐसी दिलवाओ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'