Thursday, February 27, 2025

बुढ़ापे की रात


देखो बूढ़े बुढ़िया कैसे रात बिताते हैं 


नींद नहीं आती है तो रह रह बतियाते हैं 


यह मत पूछो कैसे उनकी रात गुजरती है,

कोशिश करते सोने की पर सो ना पाते हैं 


एक दूजे की सभी शिकायत शिकवे जो भी है,

सभी रात को आपस में निपटाए जाते हैं 


कभी झगड़ना,गुस्साहोना और मनाना फिर ,

सोने की कोशिश करते,भरते खर्राटे है


कभी पुराने किस्से की फाइल जब खुलती है, भूली बिसरी यादों का आनंद उठाते हैं 


मन प्रपंच से हटा, भूल सब बीती बातों को, 

बीत गई सो बीत गई ,खुद को समझाते हैं


सुबह आयेगी, खुशी लायेगी, ये उम्मीद लिए,

कुछ पल को सपनों की दुनिया में खो जाते है


 देखो बूढ़े बुढ़िया कैसे रात बिताते हैं


मदन मोहन बाहेती घोटू 

आएगा एक दिन सबका अंत 

थम जाएगा यूं ही अचानक सांसों का यह तंत्र

कोई भाग्यवान जो जन्मा,बन कर के श्रीमंत

कोई दुखी गरीब बिचारा ,पीड़ा पाई अनंत 

सबने सारे मौसम देखे ,गर्मी ,शीत, बसंत 

तेरे अपने साथ तभी तक,जब तक तू जीवंत 

मरने पर ना पास रखेंगे, देंगे फूंक तुरंत 

अंतिम सबकी यही गति है, राजा हो या संत

 साथ जाएंगे कर्म ,किए हैं जो जीवन पर्यंत

 सबसे करके प्रेम लूट ले जीवन का आनंद

 आएगा एक दिन सबका अंत

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Wednesday, February 26, 2025

क्या करना है बुढ़ापे में 


 तब, जब मैं अपनी जवानी के चरम में था 

मोह माया के भरम में था 

चाहता था कमाना खूब पैसा 

कमाई की धुन में रहता था हमेशा 

व्यस्तताएं इतनी थी दिनभर 

फुर्सत नहीं मिल पाती थी पल भर 

परिवार और गृहस्थी की जिम्मेदारी 

नौकरी और दफ्तर की मारामारी 

सुबह से शाम 

बस काम ही काम 

बस एक ही धुन थी बहुत सारा पैसा कमा कर एश करूंगा बुढ़ापे में जाकर 

तब मैं सोचा करता था भगवान ऐसे दिन कब देख पाऊंगा 

जब पूरे दिन भर अपनी मर्जी से आराम से सो पाऊंगा 

अपनी मर्जी से जिऊंगा 

 खाऊंगा ,पिऊंगा 

आखिर भगवान ने मेरी सुन ली मेरा सपना सच हो गया 

और एक दिन में रिटायर हो गया 


अब दिन भर निठल्ले बैठा रहता हूं 

बेमतलब इकल्ले बैठा रहता हूं 

नहीं करना कोई काम धाम 

दिन भर बस आराम नहीं आराम 

टीवी पर देखते रहो मनचाही पिक्चर 

या फिर बिस्तर पर पड़े रहो दिन भर 

न नौकरी की भागा दौड़ी न बॉस की चमचागिरी दिनभर एकदम फ्री 

वैसे तो पूरा हो गया मेरा जवानी का स्वपन 

पर अब मुझे कचोटता है  एकाकीपन 

आज मुझे इस बात आ गया है ज्ञान 

कि बिना काम किये जीना नहीं आसान 

बुढ़ापे में आकर बात यह मैंने जानी 

निठल्ला जीवन काटने में होती है बड़ी परेशानी

आज मेरे पास पैसा है बहुत सारा 

पर मैं इंजॉय नहीं कर पा रहा हूं मैं बेचारा 

ठीक से रहती सेहत नहीं है 

बदन में बची हिम्मत नहीं है 

बिमारियों ने घेर रखा है 

अपनो ने मुंह फेर रखा है 

आप जाकर की यह बात मेरी समझ में आई एंजॉय करते रहो अपनी कमाई 

बचत उतनी ही अच्छी के हो सके आराम से बुढ़ापा गुजारना 

किसी के आगे हाथ ना पड़े पसारना 

तो मेरे मित्रों मेरा अनुभव यह बताता है 

बचत का पैसा ज्यादा भी हो तो बुढ़ापे में सताता है 

छुपा कर रखो तो डूब जाएगा 

वरना मरने के बाद बच्चों में झगड़े करवाएगा 

ऐसी नौबत को जीते जी काट दो

जिसको जो देना है पहले ही बांट दो

बुढ़ापे में माया से ज्यादा मोहब्बत मत करो 

थोड़ी दीन दुखियों की सेवा कर  पुण्य की गठरी भरो

प्रभु नाम का स्मरण दिन रात करो 

चैन से जियो और चैन से मरो 


मदन मोहन बाहेती घोटू

Monday, February 24, 2025

आओ हम तुम चले प्रयाग 
एक डुबकी संगम में ले ले, धन्य हमारे भाग 

एक सौ चुम्मालिस वर्षों में आया यह संजोग 
महाकुंभ का लाभ उठाने पहुंचे कितने लोग

 कितने सारे साधु बाबा योगी और महंत 
कई अखाड़े मंडलेश्वर के, एकत्रित सब संत

 बड़े-बड़े भंडारे चलते, कथा ,यज्ञ ,उपदेश 
इस अवसर का लाभ उठाने पहुंचा पूरा देश 

उमड़ रही है भीड़ कर रहे हैं सब गंगा स्नान 
उठा रहे हैं परेशानियां, नहीं रहे पर मान

एक डुबकी में पुण्य कमाते और धो रहे पाप 
इस मौके से फिर क्यों वंचित रहते मै और आप

दिखा रहे हैं धर्म सनातन के प्रति निजअनुराग 
हर हिंदू में ,धर्म आस्था ,आज गई है जाग

 आओ हम तुम चले प्रयाग 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Friday, February 21, 2025

84 वें जन्मदिन पर 

कोई निशा अमावस सी थी 
कोई रात थी पूरनमासी 
जैसे तैसे ,एक-एक करके,
 कटे उमर के बरस तिर्यासी 

टेढ़ा मेढ़ा जीवन पथ था,
कई मोड़ थे ,चौड़े ,सकड़े 
मैंने पार किया सब रस्ता,
बस धीरज की उंगली पकड़े 
मिला साथ कितने अपनों का 
कई दोस्त तो दुश्मन भी थे 
कभी धूप, तूफान , बारिशे ,
तो बासंती मौसम भी थे 
महानगर की चमक दमक में
 भटका नहीं ग्राम का वासी
जैसे जैसे ,एक-एक करके 
कटे उमर के बरस तिर्यासी 

हंसते गाते बचपन बीता,
 बीती करते काम, जवानी 
अब निश्चिंत,जी रहे जीवन ,
आया बुढ़ापा, उम्र सुहानी 
बाकी ,कुछ ही दिन जीवन के 
उम्र जनित, पीड़ाएं सहते 
लिखा नियति का भोग रहे हैं 
फिर भी हम मुस्कुराते रहते 
जैसे भी कट जाए ,काट लो ,
भेद ये गहरा ,बात जरा सी 
जैसे तैसे, एक-एक करके 
कटे उम्र के बरस तिर्यासी 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Monday, January 20, 2025

सुख दुख 

बहुत हसीं यह जीवन यदि सुख से जियो
दुख के विष को त्याग शान्ति अमृत पियो 
अपने दिल को जला दुखी क्यों करते हो रोज-रोज तुम यूं ही घुट घुट मरते हो

तुमको अपने मन के माफिक जीना है
 निज पसंद का रहना ,खाना ,पीना है  
वरना लोग नहीं सुख से जीने देंगे 
बार बार वो तुम्हे परेशाँ कर देंगे

बहुत मिलेगा सुनने को तुम्हें उलहाने में
कड़वी खट्टी गंदी बातें ताने में 
कसर न होगी खोटी खरी सुनाने में
सुख वह सदा पाएंगे तुम्हें सताने में 

उनकी बातों पर जो ध्यान अगर दोगे 
अपने मन का अमन चैन सब खो दोगे 
इसीलिए मत इन बातों पर रोष करो 
जैसे भी हो सुखी रहो, संतोष करो 

इन लोगों से सदा दूरियां रखो बना 
उनकी बातों को तुम कर दो बिना सुना 
कैसे रहना सुखी तुम्हारे हाथ में है 
कैसे रहना दुखी तुम्हारे हाथ में है 

तुम जैसा चाहो वैसे जी सकते हो
नीलकंठ बन सभी गरल पी सकते हो 
सदा दुखी रहने के कई बहाने हैं 
लेकिन पहले ये सब तुम्हें भुलाने हैं 

कैसे रहना सुखी सीख लो जीवन में 
बहुत शांति और सुख पाओगे तुम मन में 
नहीं किसी से बैर भाव या क्रोध करो 
प्रतिस्पर्धा से दूर रहो ,संतोष करो 

ना ऊधो से लेना ,देना माधव को 
बोलो मीठे बोल, प्रेम बांटो सबको 
बहुत सरल है दुख में परेशान होना 
फूटी किस्मत ,बार-बार रोना-धोना 

एक बार जब मुखड़ा मोड़ोगे दुख से
भर जाएगा पूरा ही जीवन सुख से 
सुख दुख तो जीवन में आते जाते हैं 
बहुत सुखी वो ,जो हरदम मुस्काते हैं

मदन मोहन बाहेती घोटू 

मेरे घर का मौसम

ना तुझमें खराबी, ना मुझमें खराबी 
 मेरे घर का मौसम ,गुलाबी गुलाबी 

हम पर खुदा की ,है इतनी इनायत 
किसी को किसी से न शिकवा शिकायत 
मिला जो भी कुछ है, संतुष्ट हम हैं 
खुशी ही खुशी है ,नहीं कोई गम है 
किसी से कोई भी अपेक्षा नहीं है 
लिखा जो भी किस्मत में पाया वही है
 नहीं मन के अंदर ,लालच जरा भी 
मेरे घर का मौसम, गुलाबी गुलाबी 

सीमित है साधन, पर करते गुजारा 
भरा सादगी से , है जीवन हमारा 
नहीं चाह कोई तो चिंता नहीं है 
सभी को सभी कुछ तो मिलता नहीं है
मिलकर के रहते हैं, हम सीधे-सादे 
कभी राम रटते ,कभी राधे राधे 
सत्कर्म ही है ,सफलता की चाबी 
मेरे घर का मौसम गुलाबी गुलाबी

मदन मोहन बाहेती घोटू