Saturday, June 19, 2021

अभी बहुत कुछ करना आगे 

अभी बहुत कुछ करना आगे 
क्यों मुश्किल से डर, हम भागे 

सुख-दुख चिंता परेशानियां, 
जीवन संग बनी रहती है 
फिर भी अच्छे दिन आएंगे ,
मन में आस जगी रहती है 
अगर निराशा के जालों में ,
फसे रहेंगे ,पछताएंगे 
आशावादी दृष्टिकोण से ,
अगर जिएंगे, सुख पाएंगे 
परमेश्वर से अपना, सबका, 
सुख स्वास्थ्य और वैभव मांगे 
क्यों मुश्किल से डर  हम भागे 
अभी बहुत कुछ करना आगे

 यह सच है जो लिखा नियति ने,
 उसको कोई बदल ना पाया 
 लाख कमा ले कोई माया 
 साथ न कोई ले जा पाया 
 कितनी भी को विकट परिस्थिति 
 नहीं जरा भी घबराना है 
 हर मुश्किल से उबर जाएंगे 
 हिम्मत से ,बढ़ते जाना है 
 हंसते-हंसते जिएंगे हम ,
 सुबह तभी है, जब हम जागे 
 क्यों मुश्किल से डर,हम भागें
 अभी बहुत कुछ करना आगे
 
 चार दिनों का यह जीवन है,
 उसका मजा उठाएं पूरा 
 खाए पिए नाचे गाए 
 रहे न कोई शौकअधूरा  
 जब तक जियें, मस्त रहें हम,
 मन में खुशियां और चाव हो 
 जब भी जायें प्यास ना रहे ,
 मन में केवल तृप्ति भाव हो 
 रहे संतुलित जीवनचर्या ,
 अपनी मर्यादा ना लांघे
 क्यों मुश्किल से डर हम भागें
 अभी बहुत कुछ करना आगे

मदन मोहन बाहेती घोटू
छेड़छाड़ 

थोड़ी सी शरारत,
 थोड़ी सी तकरार 
 थोड़ी सी दोस्ती 
 थोड़ी सी रार
 थोड़ा सा गुस्सा 
 थोड़ा सा प्यार 
 लड़की पटाने की ,
 छोटी सी जुगाड़ 
 जी हां जनाब इसे कहते हैं छेड़छाड़
 छेड़छाड़ की कहानी 
 है कई युगों पुरानी 
 भगवान श्री कृष्ण इस आनंददाई प्रथा के संस्थापक थे उनकी गोपियों के संग छेड़छाड़ के किस्से बड़े रोचक थे कभी किसी गोपी की दूध भरी हांडी को फोड़ देना 
 कभी राधा की नाजुक कलाई मरोड़ देना 
 कभी यमुना में नहाती हुई बालाओं के वस्त्र चुरा लेना कभी माखन भरी हंडिया से माखन  खा लेना 
 उनके यह छेड़छाड़ के प्रसंग आज भी उनके भक्तों को बहुत भातें हैं 
 पर यह छेड़छाड़ नहीं ,उनकी बाल लीला कहाते हैं 
 फिर उसी युग में ,एक भयंकर छेड़छाड़ द्रोपदी ने दुर्योधन से की थी 
अंधों के बेटे तो अंधे होते हैं कह कर आग लगा दी थी इस छेड़छाड़ से दुर्योधन हो गया बड़ा क्रुद्ध था 
और इसका परिणाम महाभारत का महायुद्ध था 
पर यह सब तो पुरानी बातें हैं 
हम आपको आज के हाल-चाल बताते हैं 
हमारा पड़ोसी बॉर्डर पर जबतब छेड़छाड़ करता रहता है 
बार-बार कश्मीर का लाभ छेड़ता रहता है 
आतंकवादी  गतिविधियों से बाज नहीं आता है 
हालांकि हर बार मुंह की खाता है 
अमेरिका की रशिया से छेड़छाड़ चलती ही रहती है कभी चाइना से तकरार चलती ही रहती है 
कभी इजराइल ,कभी गाजी पट्टी 
कभी सीरिया, कभी ईरान
 एक दूसरे को छेड़छाड़ करके करते हैं परेशान 
 हमेशा यह डर रहता है कि यह छेड़छाड़ इतनी ना बढ़ जाए 
 कि कहीं तीसरा महायुद्ध ही  न छिड़ जाए 
 खैर,यह तो विश्व स्तर की बात हुई, आगे बढ़ते हैं अपनी रोजमर्रा की छेड़छाड़ की बात करते हैं 
 कुछ शरारती किस्म की लडके, जवान होती हुई लड़कियों के पीछे पड़ते हैं 
 और उनके साथ छेड़छाड़ करते हैं 
 कोई तानाकशी करता है ,कोई सीटी बजाता है 
 कोई सिरफिरा तो शरीर को छूकर बदतमीजी पर उतर आता है 
 ऑफिस में काम करने वाली महिलाओं के साथ सहकर्मियों की छेड़छाड़ आम बात है 
 चलती रहती कुछ न कुछ खुराफात है 
 कॉलेज के दिनों में लड़कियों को छेड़ने का मजा ही कुछ और था 
 वह तो हमने अब छोड़ छोड़ दिया वरना वह जवानी का बड़ा मजेदार दौर था 
भीड़भाड़ की छेड़छाड़ में खतरे का चांस हो सकता है 
सूनेपन की छेड़छाड़ में लड़की से रोमांस हो सकता है कुछ छेड़छाड़ यूं ही टाइम पास के लिए की जाती है और कुछ छेड़छाड़ किसी खास के लिए की जाती है 
एक शादी समारोह में एक लड़की मन को भा गई हमने उसे छेड़ दिया 
और बस ऐसे ही बात फिर आगे बढी ओर उसके मां-बाप ने उसे उम्र भर के लिए हमारे साथ भेड दिया 
वह आजकल हमारी पत्नी है पर उससे छेड़छाड़ करने में हमें डर लगता है 
क्योंकि मख्खी के छत्ते को छेड़ने का अंजाम सबको पता है 
आजकल बुढ़ापे में भी हम छेड़छाड़ का मजा उठाते हैं 
अपनी बुढ़ियाती पत्नी को, जवानी की छेड़छाड़ के किस्से सुनाते हैं 
और जब कुछ दोहराते हैं 
तो बड़ी लताड़ पाते हैं

मदन मोहन बाहेती घोटू

Wednesday, June 16, 2021


यह क्या हो गया देखते देखते

 भरतिये में आदन  रखकर उबलने वाली दाल को ,कब सीटी बजाने वाले कुकर से प्यार हो गया 
 पता ही न चला
 लकड़ी से जलने वाले चूल्हेऔर कोयले की अंगीठी का कब स्टोवऔर गैस के चूल्हे में अवतार हो गया
 पता ही न चला
  मिट्टी के मटके में भरा हुआ पीने का पानी कब प्लास्टिक की बोतलों में समाने लगा 
  पता ही नहीं चला
  हाथों से डुलने वाला पंखा कब छत पर चढ़ कर फरफराने  लगा 
  पता ही नहीं चला
  सुबह-सुबह अपनी चहचहाट से जगाने वाली गौरैया कहां गुम हो गई 
  पता ही न चला
  दालान में बिछी कच्ची ईंटे ,लोगों का चरण स्पर्श करते करते कब  टाइलें बन गई
  पता ही न लगा
 झुनझुना बजा कर खुश होने वाले बच्चों के हाथ में कब मोबाइल आ गया 
 पता ही न चला
 अपनी मंजिल पर पहुंचने के लिए लिफ्ट ने सीढ़िया चढ़ने की जरूरत को हटा गया
 पता ही न चला
 अमराई के फल और हवा देने वाले पेड़ ,कब कट कर बन गए चौखट और दरवाजे 
 पता ही न चला
  कलकलाती नदियां , लहराते सरोवर और पनघट वाले मीठे पानी के कुवों से कब रूठ गए पानी के श्रोत ताज़े
  पता ही न चला
  चिल्लर के खनखनाते हुए सिक्कों ने कब चलना छोड़ दिया 
  पता ही न चला
 प्रदूषण का रावण कब प्राणदायिनी हवा का अपहरण करके उसे ले गया 
 पता ही न चला
 अपनो का साथ छोड़ किसी अनजाने से आत्मिक रिश्ते कैसे जुड़ गए 
 पता ही न चला
 लहराते घने केश , चिंताओ के बोझ से कब उड़ गए,
 पता ही न चला 
 देखते ही देखते जवानी कब रेत की तरह मुट्ठी से फिसल गई
 पता ही न चला
 बचपन की किलकारियां कब बुढ़ापे की सिसकारियों में बदल गई
 पता ही  न चला
हमने माया को ठगा या माया ने हमें ठग कर हमारी ये गति बना दी
पता ही न चला
 तीव्र गति से आई प्रगति ने हमारी क्या दुर्गती बना दी
 पता ही न चला

मदन मोहन बाहेती घोटू


बारिश के मौसम में

सावन की रिमझिम में चाय की चुस्की हो ,
गरम पकोड़े के संग, सांझ वह सुहानी हो 
चाट के ठेले पर आलू की टिक्की हो ,
और गोलगप्पे संग,खटमिठ्ठा पानी हो
भुना हुआ भुट्टा हो, ताज़ा और गरम गरम,
सोंधी सी खुशबू का, मज़ा और ही आता
गरम गरम हलवा हो और साथ में पापड़,
काबू फिर जिव्हा पर,कोई ना रख पाता
मिले समोसे के संग, जलेबियां गरम गरम,
हर लम्हा रोमांटिक, प्यारा हो फुरसत का
सुन्दर सी रसवंती, प्रेमप्रिया हो संग में
तो फिर इस दुनिया में,सुख आए जन्नत का

मदन मोहन बाहेती घोटू
यह क्या हो गया देखते देखते

 भरतिये में आदन  रखकर उबलने वाली दाल को ,कब सीटी बजाने वाले कुकर से प्यार हो गया 
 पता ही न चला
 लकड़ी से जलने वाले चूल्हेऔर कोयले की अंगीठी कब स्टोवऔर गैस के चूल्हे में बदल गई 
 पता ही न चला
  मिट्टी के मटके में भरा हुआ पीने का पानी कब प्लास्टिक की बोतलों में समाने लगा 
  पता ही नहीं चला
  हाथों से डुलने वाला पंखा कब छत पर चढ़ कर फरफराने  लगा 
  पता ही नहीं चला
  सुबह-सुबह अपनी चहचहाट से जगाने वाली गौरैया कहां गुम हो गई 
  पता ही न चला
  दालान में बिछी कच्ची ईंटे ,लोगों का चरण स्पर्श करते करते कब की टाइलें बन गई
  पता ही न लगा
 झुनझुना बजा कर खुश होने वाले बच्चों के हाथ में कब मोबाइल आ गया 
 पता ही न चला
 अपनी मंजिल पर पहुंचने के लिए लिफ्ट ने सीढ़िया चढ़ने की जरूरत ही हटा दी,
 पता ही न चला
 अमराई के फल और हवा देने वाले पेड़ ,कब चौखट और दरवाजे बन गए 
 पता ही न चला
  कलकलाती नदियां , लहराते सरोवर और पनघट वाले मीठे पानी के कुवों से कब पानी रूठ गया
  पता ही न चला
  चिल्लर के खनखनाते सिक्कों ने कब चलना छोड़ दिया 
  पता ही न चला
 प्रदूषण का रावण कब प्राणदायिनी हवा का अपहरण करके उसे ले गया 
 पता ही न चला
 गिल्ली डंडा खेलने वाले हाथों में कब क्रिकेट का बल्ला आ गया,
 पता ही न चला
 अपनो का साथ छोड़ किसी अनजाने से आत्मिक रिश्ते कैसे जुड़ गए 
 पता ही न चला
 लहराते घने केश , चिंताओ के बोझ से कब उड़ गए,
 पता ही न चला 
 देखते ही देखते जवानी कब रेत की तरह मुट्ठी से फिसल गई
 पता ही न चला
 बचपन की किलकारियां कब बुढ़ापे की सिसकारियों में बदल गई
 पता ही  न चला
 तीव्र गति से आई प्रगति ने हमारी क्या दुर्गती बना दी
 पता ही न चला

मदन मोहन बाहेती घोटू

Saturday, June 12, 2021

लातों के भूत

 हम लातों के भूत, बात से नहीं मानते 
 कोई सुने ना सुने, हमेशा डींग हांकते 
 
बचपन में जब छड़ी गुरुजी की थी पड़ती 
तभी हमारे सर पर, विद्या देवी चढ़ती 
ऐंठे जाते कान ,बनाते मुर्गे जैसा 
या कि बेंच पर रहना पड़ता खड़ा हमेशा
करती बुद्धि काम, समझ में सब कुछ आता 
लंगड़ी भिन्न सवाल ,तभी सुलझाया जाता  
अपना पाठ ठीक से करना, तभी जानते 
हम लातों के भूत, बात से नहीं मानते 

फिर इतने दिन अंग्रेजों की गुलामी 
वह तो गए, न हमने छोड़ी पूछ हिलानी 
चाटुकारिता करते रहना , भूल न पाये
कहां आत्मसम्मान खो गया समझ नआये
कब तक सोये यूं ही रहेंगे ,कब जागेंगे 
कब उबलेगा खून, हक अपना मांगेंगे 
क्यों ना रुद्र रूप दिखला ,हम  भृकुटी तानते
हम लातों के भूत ,बात से नहीं मानते 

मदन मोहन बाहेती घोटू

Thursday, June 10, 2021

क्या यह भी जीना है 

अपनी इच्छाओं पर बस कर 
यूं ही जीना तरस तरस कर 
क्या हम को हक नहीं बुढ़ापा,
अपना कांटे ,हम हंस-हंसकर 

बाकी सब तो ठीक-ठाक है 
लेकिन तन तंदुरुस्त नहीं है 
ना है पहले सा फुर्तीला ,
सुस्त पड़ा है , चुस्त नहीं है 

ये मत खाओ वो मत पियो 
लगी हुई हम पर पाबंदी 
तन के द्वारों पर रोगों ने 
लगा रखी है नाकाबंदी 

आंखों में जाला छाया है 
श्रवण शक्ति भी हुई मंद है 
चलते हैं तो सांस फूलती,
और दर्द दे रहे दंत हैं 

किडनी लीवर आमाशय के 
कारण पीड़ित अन्य द्वार हैं 
कमजोरी ने घेर रखा है 
तन और मन दोनों बीमार हैं  

ऐसी कठिन परिस्थितियों में 
जीना होता कितना दुष्कर
फिर भी बच्चे कहते पापा ,
जिओ खुशी से तुम हंस-हंसकर 

सुबह शाम दोपहर दवाई,
आधा पेट इन्ही से भरता 
फिर भी झेल रहे हैं यह सब 
मरता क्या न भला है करता 

भुगत रहे जो लिखा भाग्य में
 यूं ही किसी को हम क्यों कोसें
 छोड़ दिया है हमने अब तो ,
 सब कुछ ही भगवान भरोसे 
 
उबला खाना, बिना मसाला 
दूध चाय फीका पीना है 
इसको ही जीना कहते हैं 
तो फिर ऐसे ही जीना है

मदन मोहन बाहेती घोटू