Tuesday, June 14, 2011

क्षणिकायें

क्षणिकायें
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पी.ए
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साहब के पी. ए .हैं,
पत्नी के पिया
बच्चों के डबल पी ए
याने कि पापा

खतरा

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मेरी पत्नी को,
कोई खतरा,
न उनसे है,न इनसे है
सिर्फ,
पड़ोसन कि 'सिन' से है

विरह गीत

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तुम वहां,
मै यहाँ,
इतनी दूर और ऐसे
बीरबल कि खिचड़ी
पके तो कैसे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

और

और
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बात नहीं कुछ,
विषय नहीं कुछ
बोअर हो गए ;
तो तुम बोले और सुनाओ
आओ!आओ!
करें सिलसिला,फिरसे चालू,
हम बातों का,
जोर जोर से
अगर गौर से देखोगे तो,
चारों और सुनाई देगा ,शोर 'और' का
जोर शोर से
देखोगे ,जग के जन जन में
सब के मन में
सिर्फ 'और' की आस जगी है
सिर्फ 'और'की प्यास लगी है
जिसके पास जरा है थोडा रूखा सूखा,
अगर उसे कुछ मिला भाग्य से या मेहनत से,
पर उसको संतोष न होगा,
ज्यादा से ज्यादा पाने की प्यास बढ़ेगी
पीने की तो प्यास बुझे पानी से लेकिन,
पाने की तो प्यास कभी भी नहीं बुझेगी
क्योंकि जो जितना पाता है
उतना ज्यादा ललचाता है
इतना सब कुछ पाने पर भी,
थोडा भी संतोष नहीं है,
मानव मन में
और 'और' की ओर बढ़ रहा,
आज हमारे इस समाज का'
ढांचा ही कुछ बदला होता,
अगर और की प्यास न होती
किन्तु'और ' तो अजर अमर है
जब तक जीवन है,दुनिया है,
'और' रहेगा
सिर्फ रहेगा नहीं ,'ओंर'ही राज्य करेगा
क्योकि 'और' पर जोर नहीं है
और 'और' का छोर नहीं है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'



मज़ा बुढ़ापे का

मज़ा बुढ़ापे का
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सीनियर सिटिज़न हैं,हुए रिटायर हम हैं,
                  मस्ती का आलम है,मौज हम मनाते हैं
नहीं कोई काम धाम,अब तो बस है आराम,
                   तीरथ और ग्राम ग्राम ,घूमते घुमाते हैं
आजकल निठल्ले हैं,एकदम अकेल्ले हैं,
                   पैसा जो पल्ले है,खरचते,उड़ाते है
कैसा भी हो मौसम,नहीं कोई चिंता गम,
                     मज़ा बुढ़ापे का हम,जम कर उठाते है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

माँ, बाप और नानी

माँ, बाप और नानी
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बच्चा हो,औरत हो या मर्द
जब भी होता है दर्द
मुहं से निकलता है 'उई माँ'
जब भी लगती है चोंट,
या होती है पीड़ा
याद आती है माँ
और माँ का नाम ही,
दर्द को सहलाता है
करार लाता है
और जब भी देखतें है,
कुछ चीज भयंकर
या लगता है डर,
तो मुंह से निकलता है
'बाप रे बाप'
कभी सोचा है आपने
एसा क्या किया है बाप ने
जो डर और अचरज में याद आ जाता है
जब कि वो भी बराबर प्यार लुटाता है
और जब होती है बड़ी परेशानी
लोग कहते है,याद आती है नानी
नानी याने माँ कि माँ
डबल ममता
क्या है इन सबका कारण?
शायद माँ की ममता ,लाड़  प्यार
और पिता का अनुशासन

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Monday, June 13, 2011

वक्र-चक्र

वक्र-चक्र
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लचकीली जिव्हा है,लचकीली ग्रिव्हा है,
         और कमर लचकीली, ने मन  ललचाया है
देह ऐसी प्रभु दीन ,कटि तेरी बहुत क्षीण,
         ऊपर उन्नत उरोज,से तन सजाया है
नीचे  नितम्ब भार,मतवाली चलत चाल,
         जाल वक्र रेखा का तन पर बिछाया है
मुस्काते अधर वक्र,देखे तो नज़र वक्र,
            तेरी वक्र रेखाओं ने तो कमाल ढाया है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'
     

     

Sunday, June 12, 2011

रावण के दस सर

रावण के दस सर
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रावण ,वीर था,और विद्वान था
उसे शास्त्र और शास्त्र  दोनों का ज्ञान था
और उसके दस सर थे
और ये ही मुसीबत की जड़ थे
 एक सर बीच में था,
और एक तरफ चार सर थे ,
और दूसरी तरफ पांच सर थे
इससे उसके दिमाग का बेलेंस बिगड़ गया था,
और वो सीताहरण जैसी हरकत कर गया था
काश उसके नौ या ग्यारह सर होते
और दिमाग का बेलेंस बराबर हो जाता
तो आज उसकी भी तारीफ होती
और वो पूजा जाता

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

लंका दहन

लंका दहन
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लंका का राजा रावण,
था महान वैज्ञानिक ,
और उसकी सोच थी,
बड़ी आधुनिक
उसके पास,आधुनिकतम,
हथियारों का भंडार था
उसका खुद का हेलिकोप्टर,पुष्पक,
बेमिसाल था
उसने जब लंका का टाउन प्लानिग किया
जल वितरण के लिए,नलों की व्यवस्था की,
लोग बोले, उसने वरुण को कैद कर लिया
 लंका के सारे घरों का डिजाइन एक जैसा करवाया
सभी भवनों के शिखरों को सोने से मंडवाया
इसीलिए लंका,सोने की लंका कहलाई
पर बाद में इसी ने मुसीबत ढाई
बाकि तो सब ठीक था
पर उसका सिविल मेंटेनन्स विभाग ,
थोडा वीक था
सीताजी की तलाश में,
हनुमानजी ने ,जब लंका का हर घर खंगाला था
तो कई छतों पर,
सोने की परत उखड़ी पड़ी थी,
नीचे कुछ काला काला था
हनुमानजी ने जब विवेचन किया
तो पाया की काली काली चपड़ी थी,
जिस पर था सोने के पतरे को मड दिया
और अंत में जब सीताजी ,
रावण के फार्महाउस 'अशोक वाटिका' में मिली
 और रावण द्वारा पकडे जाने पर,
हनुमानजी की पूँछ जली
कहते है हनुमानजी का दिमाग,
कंप्यूटर से भी तेज था,
उन्हें छतों पर,सोने की परत के नीचे,
काली काली चपड़ी की याद आई
तो उन्होंने छतों पर छलांग लगायी
और क्योंकि चपड़ी ,बहुत ज्वलनशील होती है,
उसमे आग लग गयी
और सोने की लंका जल गयी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'